April 28, 2017

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सुविधा का देशद्रोह

किसी आंदोलन को दबाने या फिर अपने विरोध में आवाज उठाने वालों का मुंह बंद करने का सबसे आसान तरीका इन दिनों देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करना हो गया लगता है।

Author April 13, 2017 05:13 am
तिरंगे की तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

किसी आंदोलन को दबाने या फिर अपने विरोध में आवाज उठाने वालों का मुंह बंद करने का सबसे आसान तरीका इन दिनों देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करना हो गया लगता है। पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में फीस बढ़ोतरी का विरोध कर रहे छात्रों में से छियासठ के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करना इसका ताजा उदाहरण है। विश्वविद्यालय ने अनेक पाठ्यक्रमों की फीस में बेतहाशा वृद्धि कर दी है। दो गुना से लेकर दस गुना तक। अब तक जिस पाठ्यक्रम के लिए विद्यार्थियों को करीब पांच हजार रुपए फीस भरनी पढ़ती थी, उसके लिए नए नियमों के तहत पचास हजार रुपए अदा करने होंगे। इसे लेकर सभी धड़ों के विद्यार्थी संगठनों ने एकजुट होकर विश्वविद्यालय बंद का आह्वान किया था। छात्र नेता कुलपति से बात करना चाहते थे, पर उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया। इस पर छात्रों ने कुलपति कार्यालय का दरवाजा तोड़ने की कोशिश की। तब पुलिस ने उन पर लाठियां बरसानी शुरू कर दीं। इस पर छात्रों ने भी पुलिस पर हिंसक हमले किए, जिसमें कई विद्यार्थी और पुलिसकर्मी घायल हो गए। इसी घटना के मद्देनजर छियासठ विद्यार्थियों के विरुद्ध देशद्रोह का मुकदमा दायर कराया गया।

समझना मुश्किल है कि विद्यार्थियों से मिलने में कुलपति को क्या परेशानी थी। अगर वे किसी जरूरी काम में व्यस्त थे तो मिलने का कोई और समय दे सकते थे। अपनी सुविधाओं-असुविधाओं, पढ़ाई-लिखाई, फीस वगैरह के बारे में कुलपति या किसी जवाबदेह वरिष्ठ अधिकारी से जानकारी हासिल करना विद्यार्थियों और छात्र संगठनों का जनतांत्रिक अधिकार है। अगर पंजाब विश्वविद्यालय के छात्रों को फीस बढ़ोतरी के फैसले पर एतराज है तो विश्वविद्यालय प्रशासन को पारदर्शी तरीके से उसके तमाम पहलुओं को स्पष्ट करना चाहिए। यह ठीक है कि विश्वविद्यालयों को अपने फैसले खुद करने की स्वायत्तता है, मगर इसका यह अर्थ कतई नहीं लगाया जा सकता कि वह अपनी मर्जी से कोई अतार्किक फैसला विद्यार्थियों पर थोप दे। वित्तीय समस्याओं के समाधान के लिए विश्वविद्यालयों को कई बार फीस में बढ़ोतरी या फिर कुछ ऐसे पाठ्यक्रम शुरू करने पर विवश होना पड़ता है, जिनके माध्यम से पैसे जमा किए जा सकें, पर उसके पीछे भी वाजिब तर्क होना जरूरी है।

दरअसल, जब से केंद्र में भाजपा की सरकार बनी है, केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपति और प्रशासनिक अधिकारियों में जैसे यह दिखाने की होड़ लग गई है कि वे उसी की नीतियों के अनुरूप कामकाज कर रहे हैं। इसी के चलते विद्यार्थियों के आंदोलनों को अक्सर देशद्रोह का रंग दे दिया जा रहा है। पंजाब विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन में न तो ऐसा कोई नारा लगा, न कोई ऐसी हरकत दिखी, जिसे प्रथमदृष्टया देशद्रोह कहा जा सके। मगर चूंकि पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय आदि जगहों पर इसी डंडे के बल पर छात्रों को काबू में लाने का प्रयास किया जा चुका है, इसलिए पंजाब विश्वविद्यालय प्रशासन को भी यह नुस्खा कारगर लगा होगा। इसके जरिए वह केंद्र सरकार को भी खुश करना चाहता होगा कि वह देशद्रोह संबंधी गतिविधियों को लेकर कितना सख्त है। मगर ऐसी कार्रवाइयों से न सिर्फ पढ़ाई-लिखाई का माहौल बिगड़ता है, बल्कि प्रशासन और विद्यार्थियों के बीच लगातार तनाव की स्थिति बनी रहती है। विश्वविद्यालयों का काम पढ़ाई-लिखाई का बेहतर माहौल तैयार करना है, न कि सरकार को खुश करने की गरज से विद्यार्थियों के खिलाफ मनमानी कार्रवाई करना। पंजाब विश्वविद्यालय प्रशासन को जितना जल्दी हो सके लोकतांत्रिक और पारदर्शी तरीके से इस मसले को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए।

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First Published on April 13, 2017 5:13 am

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