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संपादकीय: सतह पर टकराव

ताजा घटनाक्रम दो मंत्रियों की बर्खास्तगी से शुरू होकर मुख्य सचिव को उनके पद से हटाए जाने और अब शिवपाल सिंह यादव से सभी महत्त्वपूर्ण विभाग ले लेने के रूप में सामने आया है।
Author नई दिल्ली | September 15, 2016 04:03 am
देर रात मुलायम सिंह से मुलाकात के बाद पार्टी अध्यक्ष शिवपाल यादव ने जारी की थी लिस्ट

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, राजनीतिक गतिविधियां तेज होती जा रही हैं। मगर हैरानी की बात है कि चुनाव नजदीक होने पर जहां राजनीतिक पार्टियां आमतौर पर खुद को संगठित और एकजुट करती हैं, वहीं सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के भीतर तीखे टकराव और उथल-पुथल के संकेत मिल रहे हैं। खुद मुलायम सिंह यादव के परिवार में खींचतान की खबरों से साफ है कि इतने सालों में उन्होंने पार्टी को जिस तरह परिवार-केंद्रित बना रखा था, अब उसमें भी महत्त्वाकांक्षाओं की लड़ाई सतह पर आने लगी है।

ताजा घटनाक्रम दो मंत्रियों की बर्खास्तगी से शुरू होकर मुख्य सचिव को उनके पद से हटाए जाने और अब शिवपाल सिंह यादव से सभी महत्त्वपूर्ण विभाग ले लेने के रूप में सामने आया है। मगर शिवपाल सिंह का कद कम करने का यह फैसला शायद मुलायम सिंह की ओर से उन्हें समाजवादी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष घोषित करने की प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया है। हालांकि अखिलेश के अपने चाचा शिवपाल सिंह से टकराव का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कौमी एकता दल के विलय और उनके चहेतों के खिलाफ कार्रवाई के मसले पर दोनों के बीच तल्खी काफी बढ़ गई थी। मगर इस बार मतभेद सतह पर आ गया है। इस उठापटक के बीच मुलायम सिंह ने सबको समझाने की गरज से दिल्ली तलब किया, जिसका असर यह हुआ कि अखिलेश यादव ने कहा कि परिवार एक है, झगड़ा सरकार में है; घर या बाहर के लोग हस्तक्षेप करेंगे तो पार्टी और सरकार कैसे चलेगी! यह इस बात का संकेत है कि तल्खी को कम करने की कवायद कुछ असर कर रही है। मगर शिवपाल सिंह ने जिस तरह अखिलेश के बजाय उनके पिता मुलायम सिंह की बातों को तरजीह देने का इरादा जताया, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अब तक परिवार के इर्द-गिर्द सिमटी समाजवादी पार्टी की राजनीति के भीतर किस तरह सत्ता के कई केंद्र खड़े हो चुके हैं और सभी अपनी-अपनी शक्ति का अहसास कराने की कोशिश में हैं।

मगर इस तरह के सुलह आमतौर पर तात्कालिक महत्त्व के होते हैं और मौका पाते ही फिर अहं का टकराव सामने आ जाता है। यों भी, राजनीति में महत्त्वाकांक्षाओं को नियंत्रित या अनुशासित रखना जटिल काम है। उत्तर प्रदेश में सपा के मुखिया के रूप में मुलायम सिंह ने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय उसे अपने ही परिवार के नजदीक या दूर के सदस्यों से चलाने को बढ़ावा दिया। यह छिपी बात नहीं है कि पिछले साढ़े चार साल के दौरान बतौर मुख्यमंत्री अखिलेश खुद को बंधा हुआ महसूस कर रहे थे और पार्टी या सरकार में बैठे उनके कद्दावर संबंधी उनके नाम पर अपना हित साध रहे थे। हालत यह दिखी कि मंत्री से लेकर सचिव तक की नियुक्ति के मामले में अखिलेश के सामने शायद अपने पिता की मर्जी का खयाल रखने की लाचारी थी। इसलिए अब अगर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे मंत्रियों की बर्खास्तगी और मुख्य सचिव को हटाने या फिर अपने चाचा शिवपाल सिंह के मामले में उन्होंने कुछ सख्त फैसले किए हैं तो उनके रुख में इस अचानक बदलाव से उथल-पुथल होना स्वाभाविक है। मगर समस्या यह है कि नजदीक आते विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इस घटनाक्रम का सपा की छवि और ताकत पर जो असर पड़ेगा, उसकी भरपाई कैसे हो पाएगी!

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