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संपादकीय: सुलह बीच कलह

उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के भीतर चल रहा सत्ता-संघर्ष कथित आपसी समझौते के बावजूद बहत्तर घंटे में फिर सतह पर आ गया।
Author September 21, 2016 00:11 am
देर रात मुलायम सिंह से मुलाकात के बाद पार्टी अध्यक्ष शिवपाल यादव ने जारी की थी लिस्ट

उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के भीतर चल रहा सत्ता-संघर्ष कथित आपसी समझौते के बावजूद बहत्तर घंटे में फिर सतह पर आ गया। तीन दिन पहले पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्री-बेटे अखिलेश यादव और मंत्री-भाई शिवपाल यादव के बीच सुलह हो जाने का एलान किया था। बदले में अखिलेश यादव के कुछ फैसलों को पलटा भी गया था। मुलायम सिंह ने पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष पद अखिलेश यादव से लेकर शिवपाल यादव को दे दिया। भ्रष्टाचार के आरोप में हटाए कैबिनेट मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति की मंत्रिमंडल में बहाली करा दी गई। अखिलेश यादव की मांग पर आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट बांटने का अधिकार उन्हें दे दिया गया। अखिलेश और शिवपाल, दोनों ने मुलायम सिंह में अपना विश्वास जताया था। दोनों ने खुद कहा था कि समस्या खत्म हो गई है।

अखिलेश यादव ने कहा था कि मुलायम सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, मगर उनके पिता भी हैं। इसलिए वह, उन्हें निराश नहीं करेंगे। मुलायम सिंह झगड़ा निपटाकर खुद दिल्ली रवाना हो गए। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव ने जिस तरह पहले पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव के भांजे और विधान परिषद सदस्य को और फिर अखिलेश समर्थक तीन विधान परिषद सदस्यों और युवा संगठन के चार प्रमुख पदाधिकारियों को पार्टी से निकाला है, उससे साफ है कि आपसी टकराव खत्म नहीं हुआ है। जो खींचतान अंदर करवट ले रही थी, उसे बस ऊपर से रंग-रोगन कर दिया गया था। शिवपाल यादव की ताजा कार्रवाई को, लोक निर्माण विभाग उनसे छीन लिये जाने के अखिलेश यादव के फैसले की प्रतिक्रिया माना जा रहा है।

गौर से देखें तो सपा में कलह का जो ताजा उभार दिख रहा है, वह तीन दिन पहले हुए समझौते की बुनियाद में पहले से ही मौजूद था। भ्रष्टाचार के आरोप में हटाए शख्स की मंत्री के तौर पर दोबारा ताजपोशी अखिलेश यादव के लिए अपमान का घूंट पीने जैसा था तो लोक निर्माण विभाग छीना जाना शिवपाल को नहीं पच रहा था। समाजवादी पार्टी की त्रासदी यही है कि यह कुल मिलाकर एक परिवार की जागीर बन कर रह गई है। लग रहा है जैसे मध्य-काल की दिल्ली-सल्तनत का कोई नाटक दोहराया जा रहा है। इसमें सही कौन है या कौन गलत, यह सवाल फिजूल है। ले-देकर महत्त्वाकांक्षाओं के टकराने और अधिकाधिक ताकत अपने हाथ में रखने का खेल चल रहा है।

विधानसभा का आगामी चुनाव सामने है। ऐसे आड़े वक्त में पार्टी के भीतर मची घमासान से नुकसान आखिर किसका होगा? जनता के बीच जो संदेश जा रहा है, वह इस पार्टी के लिए कहीं से भी हितकर नहीं है। स्वाभाविक है कि सपा के इस कलह का लाभ भाजपा, बसपा और कांग्रेस, सब उठाने की कोशिश करेंगे। बसपा चुपचाप अपनी रैलियां कर रही हैं। सपा के एक बड़े वोट बैंक यानी अल्पसंख्यकों को वह अपनी तरफ खींच रही है। सपा का मौजूदा कलह ऐसे में बसपा के लिए फायदेमंद ही साबित होगा। दूसरी तरफ, भाजपा के रणनीतिकार भी पूरे प्रदेश में आक्रामक प्रचार की तैयारी में हैं। कांग्रेस भी अपनी सीमाओं में हाथ-पैर मार रही है। सारे दल चुनाव की तैयारी में लगे हैं, जबकि सत्ता में बैठी समाजवादी पार्टी अपने कुल-बैर से जूझ रही है!

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