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संपादकीय: संभावना के समीकरण

अखिलेश ने शिवपाल को मंत्रिमंडल से निकाला तो मुलायम सिंह ने राष्ट्रीय महासचिव के पद से रामगोपाल यादव को हटा दिया, जो अखिलेश के विश्वस्त सलाहकार समझे जाते हैं।
Author October 25, 2016 02:48 am
देर रात मुलायम सिंह से मुलाकात के बाद पार्टी अध्यक्ष शिवपाल यादव ने जारी की थी लिस्ट

समाजवादी पार्टी में मचा घमासान जारी रहने के कारण अब यह अटकल भी लगाई जाने लगी है कि क्या इससे उत्तर प्रदेश में कोई नए समीकरण बन सकते हैं। जो पार्टी आपसी झगड़े से जूझ रही हो, उसे चुनाव में नुकसान के सिवा और क्या हो सकता है! पर दिलचस्पी का एक नया विषय यह है कि क्या सपा में चल रहा टकराव कुछ और भी गुल खिला सकता है। कुछ समय पहले तक आम धारणा यही थी कि चाहे जो हो जाए, सपा में टूट नहीं होगी और थोड़ा लड़ने-झगड़ने के बाद आखिरकार पार्टी में शांति कायम हो जाएगी। ऐसी सोच के पीछे दो खास वजह रही है।

एक यह कि दोनों धड़ों के बीच पारिवारिक रिश्ता है। एक धड़े के अगुआ अखिलेश यादव हैं, तो दूसरे धड़े के शिवपाल सिंह यादव। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पिता हैं, तो शिवपाल के बड़े भाई। मुलायम सिंह के चाहने और गंभीरता से कोशिश करने पर झगड़ा सुलझ जाएगा, और दोनों धड़े मिल कर एक हो जाएंगे। एका की उम्मीद की दूसरी वजह यह रही है कि विधानसभा चुनाव की गहमागहमी शुरू हो चुकी है और ऐसे समय रस्साकशी जारी रहने का संभावित परिणाम क्या होगा, पार्टी के नेतागण समझते होंगे। लेकिन जब दोनों तरफ से बर्खास्तगी का प्रहार हुआ, तो सुलह की संभावना धूमिल पड़ गई। अखिलेश ने शिवपाल को मंत्रिमंडल से निकाला तो मुलायम सिंह ने राष्ट्रीय महासचिव के पद से रामगोपाल यादव को हटा दिया, जो अखिलेश के विश्वस्त सलाहकार समझे जाते हैं। इसमें तनिक संदेह नहीं रह गया कि शिवपाल पर मुलायम सिंह का वरदहस्त है। और लड़ाई असल में मुलायम बनाम अखिलेश का रूप ले चुकी है। कहा जा रहा था कि सोमवार को पार्टी की बैठक में सब कुछ ठीक हो जाएगा। पर वैसा होना तो दूर, तलवारें और भी खिंच गर्इं।

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इसलिए सपा में टूट हो जाए, तो कोई हैरत की बात नहीं होगी। इस अटकल को हवा इस बात से भी मिली है कि दोनों धड़े अन्य पार्टियों की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने और भाजपा के खिलाफ एक सेक्युलर मोर्चा बनाने के संकेत देने लगे हैं। दरअसल, दोनों खेमे जानते हैं कि टूट होने की सूरत में उनके लिए अकेले चुनावी चुनौती से पार पाना आसान नहीं होगा। इसलिए अब मुलायम खेमे ने यह आरोप लगाया है कि रामगोपाल यादव ने ही बिहार में ‘महागठबंधन’ के साथ सपा को नहीं जुड़ने दिया था। जाहिर है, मुलायम सिंह को अब लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की मदद की दरकार महसूस होने लगी है।

अजीत सिंह और कांग्रेस के लोग भी समाजवादी पार्टी में चल रही उथल-पुथल को इस कोण से भी देख रहे हैं कि अगर सपा में विभाजन हुआ तो इसके फलस्वरूप क्या नए समीकरण बनेंगे और क्या कोई नया मोर्चा आकार लेगा, और किसके साथ हाथ मिलाना फायदे का सौदा हो सकता है। सपा के सांगठनिक तंत्र पर मुलायम सिंह का कब्जा है, और राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते साइकिल चुनाव चिह्न पर भी। दूसरी ओर, पार्टी की युवा फौज और शायद अधिकतर विधायक भी अखिलेश के साथ हैं; वे सोचते हैं कि अखिलेश की छवि साफ-सुथरी और विकास के लिए संजीदगी से काम करने वाले नेता की है और इसे जनता के बीच भुनाया जा सकता है। जो हो, अगर सपा की आपसी लड़ाई की परिणति टूट में हुई तो सारे दलों को अपनी रणनीति पर नए सिरे से सोचना पड़ सकता है।

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  1. S
    Shrikant Sharma
    Oct 26, 2016 at 10:09 am
    श्रीकांत शर्मा न्यूयॉर्क से लिखेते हैं की समाज़वाइ पार्टी में मची उठलपुतल १९६९ की इंदिरा गाँधी की तब के कांग्रेसी bhrashth मठाधीशों से राजनैतिक लड़ाई लड़ कर jeet कर आने के याद दिल रहा है अखिलेश एक ईमानदार और सा सुथरे नेता हैं वोह क्रिमिनल्स और गुंडागरी की राजनीती नहीं करते और इसी लिए युवा मतदाता उस ही वोट देंगे वोह jeet कर आएगा.वोह भ्रष्टचार के राजनीती नहीं करते हैं और मोदी सिरकार ने भ्रश्तचरियुओं के khilaf कूच भी नहीं किया हैइस लिए भी जनता अखिलेश के फेवर में वोट देगी.
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