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संपादकीय: उपद्रव के खिलाफ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान से शायद गोरक्षकों को कुछ सबक मिले।
Author नई दिल्ली | October 13, 2016 03:48 am
राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ(आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत। (Photo:ANI)

गोरक्षा के नाम पर देश के विभिन्न हिस्सों में हुए उपद्रव और उसे लेकर केंद्र सरकार की किरकिरी के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान से शायद गोरक्षकों को कुछ सबक मिले। गुजरात के उना में गोरक्षा के नाम पर जब कुछ दलित युवकों को बेरहमी से पीटा गया और भारी तादाद में दलित समुदाय के लोग विरोध में सड़कों पर उतर आए तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कहा था कि गोरक्षा के नाम पर उपद्रव मचाने वाले अस्सी फीसद लोग आपराधिक प्रवृत्ति के हैं और वे अपने काले कारनामों को छिपाने के लिए इस तरह का रास्ता अख्तियार करते हैं।

प्रधानमंत्री ने राज्य सरकारों से ऐसे लोगों की पहचान करने और उनके खिलाफ कड़े कदम उठाने की भी अपील की। मगर इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया जा सका। अब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि गोरक्षकों को उपद्रवियों की श्रेणी में रख कर नहीं देखा जा सकता। समाज के बहुत सारे लोग लंबे समय से कानून के दायरे में शांति पूर्वक गोरक्षा करते आ रहे हैं। सरकारों को उपद्रव मचाने वालों पर नजर रखनी चाहिए। भागवत ने समाज में व्याप्त छुआछूत के आंकड़ों पर भी चिंता जताई। जब से केंद्र में भाजपा की सरकार आई है, कुछ शरारती किस्म के लोगों द्वारा गोरक्षा, धर्मांतरण आदि के नाम पर दलित और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार बढ़ा है। गोरक्षा के बहाने मवेशियों का कारोबार करने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के बहुत सारे लोगों को सरेआम मारा-पीटा गया। उनमें से कई की जान चली गई। इसी तरह मरे हुए पशुओं का चमड़ा उतारने वाले दलित समुदाय के लोगों को प्रताड़ित किया गया। ऐसी घटनाओं से इन समुदायों में खासकर भाजपा के प्रति रोष उभरा है। बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों ने केंद्र सरकार पर सीधा निशाना साधना शुरू कर दिया।

संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान ऐसे समय आया है, जब उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में विधानसभा के चुनाव निकट हैं और वहां दलितों, मुसलमानों की नाराजगी बुरा असर डाल सकती है। ऐसे में कुछ लोगों का कहना हो सकता है कि भागवत का बयान इन चुनावों के मद्देनजर आया है। क्योंकि भागवत ने संघ के स्थापना दिवस पर न सिर्फ गोरक्षा के नाम पर उपद्रव करने वालों को आड़े हाथों लिया, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ हुई सैन्य कार्रवाई और मोदी प्रशासन की भी प्रशंसा की। सवाल है कि क्या गोरक्षा के नाम पर उपद्रव मचाने वालों के खिलाफ महज नसीहतों से कोई सकारात्मक नतीजा निकलेगा। या फिर ऐसे लोगों पर नजर रखने की जिम्मेदारी सिर्फ राज्य सरकारों पर डाल कर निश्चिंत हुआ जा सकता है? जहां भी गोरक्षा के नाम पर उपद्रव फैलाने की कोशिशें हुई हैं, वहां शरारती तत्त्वों ने किसी न किसी हिंदुत्ववादी संगठन का बाना धारण कर अपनी योजनाओं को अंजाम दिया।

इसीलिए संघ और दूसरे हिंदुत्ववादी संगठनों के अलावा भाजपा पर सीधी अंगुलियां उठती रही हैं। ऐसे में केवल बयान देने के बजाय अपने कार्यकर्ताओं में ऐसा अनुशासन बनाने की जरूरत है, जिससे वे गोरक्षा के नाम पर कमजोर तबकों के लोगों को प्रताड़ित न करें। अगर कुछ शरारती तत्त्व हिंदुत्व को बदनाम करने की मंशा से ऐसा करते हैं, तो उनकी पहचान करने और दंडित कराने की जिम्मेदारी प्रशासन के साथ-साथ संघ और भाजपा कार्यकर्ताओं की भी बनती है। अगर सचमुच भाजपा और संघ इससे विचलित होते तो उनके कार्यकर्ता ऐसा करने में पीछे न होते।

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First Published on October 13, 2016 3:46 am

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