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अपराध की सनक

यों तो किसी भी अपराध के पीछे कुछ न कुछ मकसद और योजना जरूर होती है, लेकिन कई बार यह भी देखने में आता है कि कुछ लोग मामूली-सी कहासुनी या ऐंठ में कातिलाना हमला या हत्या जैसे अपराध कर डालते हैं।
Author February 21, 2017 05:57 am
प्रतीकात्मक चित्र।

यों तो किसी भी अपराध के पीछे कुछ न कुछ मकसद और योजना जरूर होती है, लेकिन कई बार यह भी देखने में आता है कि कुछ लोग मामूली-सी कहासुनी या ऐंठ में कातिलाना हमला या हत्या जैसे अपराध कर डालते हैं। मनोवैज्ञानिक ऐसे लोगों को मनो-अपराधी करार देते हैं। सवाल है कि ऐसे लोगों की पहचान कैसे की जाए और उनसे निपटने का उपाय क्या है? रविवार को दो ऐसी सन्न करने वाली घटनाएं घटीं। पश्चिमी दिल्ली के ख्याला इलाके में एक शराबी टोकाटाकी से इतना कुपित हो गया कि उसने टोकने वाले व्यक्ति और उसकी दो लड़कियों के ऊपर तेजाब फेंक दिया। तीनों का फिलहाल एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है। इस मामले में विडंबना यह भी रही कि सफदरजंग जैसे अस्पताल में जब उन्हें इलाज के लिए ले जाया गया तो वहां बेड की कमी बता कर भर्ती करने से मना कर दिया गया।

इसी तरह हरियाणा के रेवाड़ी में डीजे बनाने वाले चार युवकों ने एक शादी के दौरान दूल्हे के बड़े भाई और सीआरपीएफ के जवान की हत्या कर दी। यहां भी मामला बहुत साधारण था। शादी के वक्त डीजे खराब हो गया था, जिसे बनाने के लिए तीन-चार युवक आए थे। बनाते वक्त उन लोगों ने पिकअप तेजी से आगे बढ़ा दी, जिस पर दूल्हे के भाई ने आपत्ति ने की। फिर तो युवकों ने दूल्हे के भाई को पिकअप के भीतर खींच लिया और तेजी से दौड़ाते हुए दो किलोमीटर ले गए। फिर, सीआरपीएफ के घायल जवान को वहीं गिरा दिया, जिसकी बाद में अस्पताल में मौत हो गई।

समाज में बढ़ते अपराध को लेकर अदालतें, सरकारें, न्यायविद, विचारक समय-समय पर अपनी चिंताएं व्यक्त करते ही हैं। लेकिन अपराध शास्त्र का एक सिद्धांत यह भी कहता है कि कानून का उल्लंघन वह व्यक्ति करता है जिसे कानून का भय नहीं होता। समाज का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जिसे कानूनों की जानकारी नहीं या वे उसके प्रति सचेत नहीं हैं। पर संगीन मामलों में अपराध के अपराध होने का भान एकदम अशिक्षित व्यक्ति को भी होता है। यह अलग बात है कि कोई घोर उत्तेजना के क्षण में अपने ऊपर काबू पूरी तरह खो देता है। शराबखोरी के चलते भी यह कमजोरी समाज में पसरती जा रही है। ऊपर की दोनों घटनाओं में अपराध के पीछे किसी बड़े लाभ की कोई इच्छा काम नहीं कर रही थी, बल्कि तात्कालिक आक्रोश और अकड़ दिखाने का मनोभाव संगीन अपराध में परिणत हो गया। दोनों मामलों में अपराधी और भुक्तभोगी की कोई पुरानी जान-पहचान भी नहीं थी। सिर्फ मजा चखाने का छिछोरा अंदाज अपराधियों के दिमाग पर हावी था।

कुछ और गहराई में जाकर देखें तो पाएंगे कि शहरों में इस तरह की घटनाएं बढ़ रही हैं। रोडरेज का मामला हो या कहीं किसी बात को लेकर मामूली कहासुनी। अक्सर लोग आपा खोने लगे हैं और नौबत मारपीट से लेकर हत्या तक पहुंच जाती है। ऐसे समय में बीच-बचाव करने वाला वर्ग यानी समाज भी अक्सर कन्नी काटने में ही अपनी भलाई समझता है। अपराधियों के मन में खौफ न खाने की एक बड़ी वजह अजनबीपन से भी उपजती है। अपराधी सोचता है कि घटनास्थल से हटते ही उसकी धरपकड़ नहीं हो पाएगी, क्योंकि उसकी पहचान भी कई बार नहीं हो पाती। फिलहाल, दोनों मामलों में हमलावर गिरफ्तार कर लिए गए हैं। पर सवाल है कि हमारा समाज किधर जा रहा है।

 

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