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मनीला की राह

भारत और आसियान के रिश्तों का सवाल है, इसकी शुरुआत 1992 में हुई और इस घटना का गहरा ताल्लुक भारत में उदारीकरण का दौर शुरू होने से था।
Author November 14, 2017 03:57 am
मनीला में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मिलते पीएम नरेंद्र मोदी। (फोटो- ANI)

इस बार के आसियान सम्मेलन और ईस्ट एशिया शिखर सम्मेलन दो वजहों से खास अहमियत रखते हैं। एक इसलिए कि भारत-आसियान संबंधों के इतिहास में यह एक विशेष अवसर है। दूसरे, इस मौके पर न सिर्फ भारत-आसियान संबंध और पुख्ता हुए बल्कि कूटनीतिक रूप से एक नए व शक्तिशाली समूह के भी आकार लेने के संकेत मिले। जहां तक भारत और आसियान के रिश्तों का सवाल है, इसकी शुरुआत 1992 में हुई और इस घटना का गहरा ताल्लुक भारत में उदारीकरण का दौर शुरू होने से था। भारत ने विदेश व्यापार बढ़ाने और नए निवेश की तलाश में दक्षिण-पूर्व एशिया में भी संभावनाएं टटोलनी शुरू कीं। लुक ईस्ट पॉलिसी या पूरब की ओर देखो के नाम से जो घोषणा की गई उसके पीछे यही ललक थी। 1992 में आसियान से संवाद का विधिवत आरंभ हुआ। वर्ष 2002 में आसियान के साथ भारत का शिखर भागीदारी का रिश्ता बना, और इसके दस साल बाद, 2012 में यह रिश्ता रणनीतिक संबंध के स्तर पर भी पहुंच गया। इस तरह, यह अवसर जहां आसियान-भारत के रिश्तों के पच्चीस वर्ष, भारत की शिखर भागीदारी के पंद्रह वर्ष और दोनों के रणनीतिक संबंध के पांच वर्ष पूरे होने का है, वहीं एक बहुत महत्त्वपूर्ण नई पहल का गवाह भी।

ईस्ट एशिया शिखर सम्मेलन के दौरान ही भारत, जापान, अमेरिका और आस्ट्रेलिया ने एक नए समूह का गठन किया है, जिसे भागीदारों की संख्या के अनुरूप ‘क्वाड’ नाम दिया गया है। आसियान के इकतीसवें और पूर्वी एशिया के बारहवें शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे और आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मैल्कॉम टर्नबुल के साथ रणनीतिक मुद््दों पर बातचीत की, वहीं इन देशों के बीच अधिकारी-स्तर की औपचारिक बैठक भी हुई। ‘क्वाड’ को चीन की चुनौती से निपटने या उसे चुनौती देने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। भारत और चीन के बीच, व्यापार काफी बढ़ने के बावजूद, दशकों से अविश्वास तो बना ही रहा है, कुछ महीने पहले डोकलाम-गतिरोध के कारण यह तीखी तकरार के स्तर पर पहुंच गया था। अमेरिका और चीन एक दूसरे को मुश्किल प्रतिद्वंद्वी की तरह देखते हैं, जिनके बीच कारोबारी बातें भी होती हैं, पर एक दूसरे को घेरने की कोशिश भी चलती रहती है। चीन और जापान के रिश्ते तो खटास भरे हो ही चुके हैं। ऐसे में क्वाड यानी चतुष्टय का गठन काफी मायने रखता है। यों भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी करके कहा है कि चार देशों का यह समूह क्षेत्र में शांति-स्थायित्व और समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए एक-दूसरे से संबद्ध दृष्टिकोण और मूल्यों को लेकर चलेगा; इस समूह को किसी अन्य देश के खिलाफ नहीं माना जाना चाहिए।

लेकिन इस स्पष्टीकरण के बावजूद चीन की परेशानी का अंदाजा लगाया जा सकता है। उसने सावधानी-भरी प्रतिक्रिया में कहा है कि उम्मीद है ये चारों देश किसी तीसरे पक्ष को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। लेकिन क्वाड की पहली ही बैठक के एजेंडे में कई बातें ऐसी थीं जो चीन के माथे पर चिंता की लकीरें खींचने वाली थीं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नियम-आधारित व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय नियमों का लिहाज करने, संपर्क बढ़ाने और बेरोक-टोक नौवहन के आग्रह से जाहिर है कि दक्षिण चीन सागर के विवाद के मद््देनजर क्वाड ने चीन के रुख को अमान्य किया है। दक्षिण चीन सागर के लगभग पूरे हिस्से पर चीन दावा करता है जबकि विएतनाम, फिलीपीन्स, मलेशिया और ब्रूनेई इसका विरोध करते आ रहे हैं। भारत, जापान और अमेरिका भी इस मामले में चीन के रुख पर कई बार नाराजगी जता चुके हैं। क्या क्वाड के गठन को इस विवाद की पृष्ठभूमि से अलग करके देखा जा सकता है?

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