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पुरस्कार का संदेश

उत्तर कोरिया के एटमी परीक्षणों तथा नए परीक्षणों की धमकियों से सारा विश्व सशंकित है। यह डर सताने लगा है कि क्या हम नए विश्वयुद्ध या किसी महाविनाशकारी मंजर की तरफ बढ़ रहे हैं?
Author October 9, 2017 05:32 am
पिछले दिनों नॉर्थ कोरिया अमेरिका पर परमाणु हमले की धमकी भी दे चुका है। (Picture source- REUTERS)

कई ऐसे पुरस्कार होते हैं जो उसे प्राप्त करने वाले व्यक्ति या संस्था का सम्मान बढ़ाने के साथ-साथ कोई व्यापक संदेश भी लिये होते हैं। शांति, पर्यावरण संरक्षण और समाज सेवा या समाज के किसी कमजोर तबके के सशक्तीकरण व बेहतरी के प्रयासों के लिए दिए जाने पुरस्कारों को खासतौर से इस श्रेणी में रखा जा सकता है। इस बार का नोबेल शांति पुरस्कार एक ऐसी संस्था को मिला है जो दुनिया भर में परमाणु हथियारों के खिलाफ अपने अभियान के लिए जानी जाती है। आइसीएएन यानी ‘इंटरनेशनल कैंपेन टु एबॉलिश न्यूक्लीयर वीपन्स’ को शांति के लिए 2017 का नोबेल सम्मान दिया जाना स्वागत-योग्य है। यों तो दुनिया के सिर पर एटमी खतरा काफी समय से मंडराता रहा है। दूसरे विश्वयुद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी में इसका विनाशकारी प्रयोग भी दुनिया देख चुकी है। पर आइसीएएन को शांति का नोबेल दिए जाने की एक खास प्रासंगिकता है। उत्तर कोरिया के एटमी परीक्षणों तथा नए परीक्षणों की धमकियों से सारा विश्व सशंकित है। यह डर सताने लगा है कि क्या हम नए विश्वयुद्ध या किसी महाविनाशकारी मंजर की तरफ बढ़ रहे हैं?

हालांकि अपने सनक भरे रवैए के चलते उत्तर कोरिया अलग-थलग पड़ गया है और उसके पुराने मित्र चीन को भी उससे कन्नी काटने को मजबूर होना पड़ रहा है, फिर भी यह भय बना हुआ है कि जाने क्या होगा। यह डर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख की वजह से भी बढ़ा है, जो उत्तर कोरिया को बातचीत की मेज पर लाने और संकट को टालने के बजाय उत्तर कोरिया का वजूद मिटा देने की धमकी या चेतावनी देते रहते हैं। ट्रंप ने एक और कारण से निराश किया है। वे ईरान से हुए परमाणु समझौते की खिंचाई करते रहते हैं और इसे रद््द करने की बात कहते हैं। ऐसे में नोबेल पुरस्कार समिति ने अपने ताजा निर्णय के जरिए विश्व भर का ध्यान एटमी खतरों और परमाणु निरस्त्रीकरण के लक्ष्य की तरफ खींचा है। इस बार के नोबेल शांति पुरस्कार से विभूषित आइसीएएन ने परमाणु हथियारों को कलंकित, प्रतिबंधित और खत्म करने का माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई है। यह असल में कोई एक संस्था या संगठन नहीं है, बल्कि सौ देशों में काम कर रहे सैकड़ों गैरसरकारी संगठनों का समन्वय या मोर्चा है जिसकी स्थापना 2007 में विएना में परमाणु अप्रसार संधि पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के वक्त हुई थी।

आइसीएएन की कोशिशों की बदौलत ही इस साल जुलाई में एक सौ बाईस देशों ने परमाणु हथियारों पर प्रतिबंध से जुड़े ऐतिहासिक समझौते का समर्थन किया। अलबत्ता यह समझौता फिलहाल प्रतीकात्मक महत्त्व ही रखता है, क्योंकि परमाणु-शक्ति कहे जाने वाले किसी भी देश ने अभी इसे मंजूर नहीं किया है। फिर, सहमति देने वालों में से आधे से भी कम, सिर्फ तिरपन देशों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। पर आइसीएएन के अभियान को दुनिया की बहुत-सी जानी-मानी हस्तियों का समर्थन हासिल है जिनमें संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बान की-मून, दलाई लामा और डेसमंड टूटू से लेकर खेल व सिनेमा के बहुत-से सितारे, कलाकार, बुद्धिजीवी तथा लेखक शामिल हैं। इस पुरस्कार की सार्थकता का अगला चरण यही हो सकता है कि जुलाई में हुए समझौते को परमाणु-शक्तियां भी स्वीकारें तथा संपूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण की तरफ तेजी से बढ़ने का संकल्प लें।

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