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चुनौती के सामने

यों तो इस सब के लिए न्यायालय के निर्देश की जरूरत नहीं होनी चाहिए। पर सरकारों की तरफ से कारगर पहलकदमी के अभाव में ऐसे मामलों में भी अदालत से गुहार लगाई जाती है।
Author November 15, 2017 03:55 am
इंडिया गेट पर कोहरे का नजारा। (फाइल फोटो)

दिल्ली-एनसीआर में एक हफ्ते से जहरीली धुंध का कहर बने रहने के बाद आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को केंद्र और दिल्ली, पंजाब व हरियाणा की सरकारों को नोटिस जारी कर भयावह वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए किए जा रहे उपायों पर जवाब मांगा है। जिस याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने यह नोटिस जारी किया उसमें पंजाब-हरियाणा में पराली जलाने पर रोक लगाने व धूल-मिट्टी के गुबार से निजात दिलाने के लिए संबंधित प्राधिकार को निर्देश देने की गुहार लगाई गई है। साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों तथा सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। यों तो इस सब के लिए न्यायालय के निर्देश की जरूरत नहीं होनी चाहिए। पर सरकारों की तरफ से कारगर पहलकदमी के अभाव में ऐसे मामलों में भी अदालत से गुहार लगाई जाती है। सर्वोच्च अदालत के नोटिस को एक बड़े परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है। हमारे संविधान के अनुच्छेद-इक्कीस में जीने के अधिकार की गारंटी दी हुई है। पर इस अधिकार का क्या मतलब है, अगर सांस लेना ही दूभर हो जाए? वक्त आ गया है जब अनुच्छेद-इक्कीस को न सिर्फ खाद्य सुरक्षा बल्कि स्वच्छ पर्यावरण और सेहत के अधिकार से भी जोड़ कर देखा जाए।

अदालत की तरफ से जवाब तलबी को इस लिहाज से भी देखा जा सकता है कि हालात जीवन-मरण के होने के बावजूद राहत के लिए सरकारी स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं दिखी है। केंद्र खामोश रहा है और दिल्ली सरकार को सम-विषम के प्रयोग को चार-पांच दिन के लिए दोहराने के अलावा और कुछ नहीं सूझता। पंजाब और हरियाणा की सरकारों का व्यवहार ऐसा रहा है मानो यह केवल दिल्ली की समस्या है और इससे उनका कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन समस्या का विस्तृत निदान हो, उससे निपटने की कारगर योजना बने और उस पर कड़ाई से अमल हो, तो हालात बदले जा सकते हैं। दुनिया के कई बेहद प्रदूषित हो चुके शहरों ने अपनी आबोहवा को काफी हद तक सुधारने में सफलता पाई है। एक अध्ययन के मुताबिक दिल्ली के वायु प्रदूषण में करीब पैंतालीस फीसद हिस्सा सड़कों से उड़ने वाली धूल का होता है। फिर एक अन्य बड़ी वजह की तरफ दिल्ली हाइकोर्ट की फटकार ने इशारा किया है। दिल्ली परिवहन विभाग को खरी-खोटी सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि राजधानी में दौड़ रहे वाहन प्रदूषण नियंत्रण मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं।

एक और बड़ा कारण अस्पतालों से निकलने वाला जैविक कचरा है जिसे सामान्य कचरे के साथ मिला कर फेंक दिया जाता है और जो जलने पर जहरीली गैसें पैदा करता है। तेरह कोयला आधारित बिजली संयंत्र भी दिल्ली के लिए मुसीबत का सबब बन रहे हैं। इसलिए याचिका में उचित ही सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने की मांग की गई है।  दरअसल, वक्त आ गया है जब यातायात से लेकर ऊर्जा और विकास मॉडल तक, सब का ढांचा और सब की नीतियां नए सिरे से बनानी होंगी। बेशक पर्यावरण सुधारने के लिए एक दीर्घकालीन कार्यक्रम की जरूरत है, पर हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि कुछ मध्यम अवधि के भी कार्यक्रम चलाने होंगे और कुछ फौरी कदम भी उठाने पड़ेंगे। यह बेहद अफसोस की बात है कि किसी भी स्तर की कोई मुहिम सरकारों की तरफ से नहीं दिख रही। इस काहिली के मूल में दो बातें हैं। एक तो यह कि वे विकास के मौजूदा मॉडल को बदलने की इच्छुक नहीं हैं। दूसरे, उन्हें लगता होगा कि प्रदूषण से निपटने के क्रम में सख्त कदम उठाने होंगे और इससे उन्हें राजनीतिक नुकसान हो सकता है। पर ऐसी धारणा अंतत: समाज-घाती साबित होगी और आत्मघाती भी।

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