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संपादकीय: सजा का सबक

नीतीश हत्या मामले में आया फैसला इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि आरोपियों ने अदालत की आंख में धूल झोंकने की कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी।
Author October 5, 2016 04:34 am
नीतीश कटारा केसः सुप्रीम कोर्ट ने विकास, विशाल को माना दोषी पर कम हो सकती है सजा

नीतीश कटारा हत्या मामले में अंतिम सजा सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय के कथन से शायद सम्मान के नाम पर हत्या कर देने वालों को कुछ सबक मिले। अदालत ने कहा कि बलपूर्वक, धमकी देकर या मानसिक रूप से प्रताड़ित कर किसी महिला की स्वतंत्रता और उसकी पसंद को खत्म करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। करीब चौदह साल पहले राज्यसभा सांसद डीपी यादव के बेटे और भतीजे ने अपने एक मुलाजिम के साथ मिल कर नीतीश कटारा की इसलिए हत्या कर दी थी कि वह उनकी बहन भारती यादव से शादी करना चाहता था। हत्या के बाद नीतीश के शव को जला कर सड़क किनारे फेंक दिया था। डीएनए परीक्षण से शव की पहचान हो सकी थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने इसे जघन्यतम अपराध करार देते हुए दोषियों को आजीवन करावास की सजा बरकरार रखी। नीतीश हत्या मामले में आया फैसला इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि आरोपियों ने अदालत की आंख में धूल झोंकने की कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। उत्तर प्रदेश पुलिस ने कई अहम सबूत अदालत के सामने रखे ही नहीं। डीपी यादव उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता हैं, उनके प्रभाव में कई गवाह अपने बयान से मुकरते चले गए। इस तरह पीड़ित पक्ष का मामला कमजोर होता गया था। मगर नीतीश कटारा की मां आखिरी दम तक अपना पक्ष अदालत के सामने रखती रहीं। उनके हौसले को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप किया और मामले की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट में चलाने का आदेश दिया। फिर तथ्यों के साथ की गई छेड़छाड़ और सबूतों को मिटाने के प्रयासों पर से परदा उठना शुरू हुआ और मामले की असलियत सामने आती गई। अगर यह मामला किसी सामान्य व्यक्ति से जुड़ा होता तो शायद आरोपी बहुत पहले बरी हो गए होते।

आपराधिक मामलों में रसूख वाले दोषियों को सजा मिल पाने की दर बहुत कम है। नीतीश कटारा मामले में जिस तरह उसकी मां ने हौसला दिखाया, वैसा कम लोग दिखा पाते हैं। डीपी यादव जैसे पैसे, बाहुबल और रसूख वाले लोग अपने प्रभाव से सबूतों को नष्ट करने, तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने, गवाहों पर बयान बदलने के लिए दबाव बनाने का भरपूर प्रयास करते हैं। अगर पीड़ित पक्ष कमजोर हुआ तो उस पर तरह-तरह के लोभ-लाभ और धमकियों के जरिए मामले से हाथ खींच लेने का मानसिक दबाव बनाया जाता है। नीतीश कटारा मामले में भी ये सारे हथकंडे आजमाए गए, मगर आखिरकार कामयाबी नहीं मिल पाई। पर कहना मुश्किल है कि अदालत के इस फैसले से ऐसे कितने लोगों को सीख मिल पाएगी, जो जातीय अभिमान में अपने बेटे या बेटी की पसंद का गला घोंट देना शान समझते हैं।

हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जातीय पंचायतें सिर्फ इसलिए अनेक युवक-युवतियों को सरेआम मौत के घाट उतारने का आदेश दे चुकी हैं कि उन्होंने जाति और गोत्र से बाहर विवाह करने का साहस दिखाया। ऐसी खाप पंचायतों पर नकेल कसने की मांग काफी समय से उठती रही है, पर इस दिशा में अभी तक कोई कामयाबी नहीं मिल पाई है। इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी बड़ा कारण है। विचित्र है कि बहुत सारे मामलों में आधुनिक जीवन-शैली का अनुकरण करने वाले लोग और समुदाय भी सम्मान के लिए हत्या जैसी मध्ययुगीन बर्बर मानसिकता के शिकार हैं। नीतीश कटारा मामले में फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जो कहा उससे इन पंचायतों और जातीय अभिमान में हत्या तक को उचित मानने वालों को सबक लेने की जरूरत है।

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First Published on October 5, 2016 4:34 am

  1. A
    anurag singh
    Oct 5, 2016 at 1:41 am
    अच्छा निर्णय
    Reply
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