December 04, 2016

ताज़ा खबर

 

पाबंदी पर प्रश्न

केंद्र सरकार ने यह कार्रवाई सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर-मंत्रालयी पैनल की सिफारिश पर की है।

Author November 7, 2016 05:07 am
एनडीटीवी और पीएम मोदी के बीच तनातनी के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं।

हिंदी के समाचार चैनल एनडीटीवी इंडिया पर लगाए गए एक दिन के प्रतिबंध की स्वाभाविक ही तमाम मीडिया संगठनों ने कड़ी आलोचना की है। एडिटर्स गिल्ड, ब्राडकास्टिंग एडीटर्स एसोसिएशन और प्रेस क्लब आॅफ इंडिया जैसे सभी प्रमुख मीडिया संगठनों ने बयान जारी कर सरकार के इस कदम को घोर अलोकतांत्रिक करार देते हुए इसे फौरन वापस लेने की मांग की है। विपक्षी दलों ने भी इस पाबंदी के लिए सरकार पर हमला बोला है।

केंद्र सरकार ने यह कार्रवाई सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर-मंत्रालयी पैनल की सिफारिश पर की है। पैनल ने संबंधित चैनल को पठानकोट पर हुए आतंकी हमले की रिपोर्टिंग के दौरान ‘रणनीतिक रूप से संवेदनशील सूचनाएं’ प्रसारित करने का दोषी ठहराया है। यह सही है कि आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामले जहां सरकार के सामने कई चुनौतियां पेश करते हैं, वहीं ऐसे अवसरों पर मीडिया का काम भी आसान नहीं होता। ऐसे मौकों पर रिपोर्टिंग बहुत सतर्कता और संयम की मांग करती है। सरकार ने एनडीटीवी इंडिया को केबल टीवी नेटवर्क नियमावली-1994 की एक खास धारा के उल्लंघन का दोषी ठहराया है और नौ नवंबर को प्रसारण से विरत रहने को कहा है। लेकिन सरकार यह नहीं साफ कर पाई है कि कौन-सी रणनीतिक रूप से संवेदनशील सूचना चैनल ने उजागर कर दी, जो पहले से सार्वजनिक जानकारी में न रही हो।

दरअसल, अगर पठानकोट हमले को लेकर एनडीटीवी इंडिया की रिपोर्टिंग सरकार को नागवार गुजरी, तो उसे अपने अफसरों को हिदायत देनी चाहिए थी कि वे क्या बताएं और क्या नहीं। फिर, इस पाबंदी से यह भी सवाल उठता है कि क्या किसी आतंकी हमले के बारे में सिर्फ उतना और सिर्फ वही जानना तथा बताया जाना चाहिए जितना और जैसा सरकार बताना चाहती है? इसमें दो राय नहीं कि सरकार का यह कदम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ है, जिसकी गारंटी हमारा संविधान देता है। मीडिया की आजादी हमारे संविधान में दी गई नागरिक आजादी का ही हिस्सा है। इसलिए एनडीटीवी इंडिया को नौ नवंबर को अपना प्रसारण बंद रखने का केंद्र का आदेश जनतंत्र में आस्था रखने वाले हरेक व्यक्ति के लिए चिंता की बात होनी चाहिए।

एनडीटीवी से हर मुद््दे पर हर कोई सहमत हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन जैसे किसी को एनडीटीवी से असहमत होने का हक है, वैसे ही सरकार से एनडीटीवी को भी। अगर असहमति और आलोचना के लिए जगह नहीं होगी, तो फिर लोकतंत्र का मतलब ही क्या रह जाएगा? लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव नहीं होता, यह भी होता है कि नागरिक अधिकारों के साथ कैसा सलूक किया जाता है। क्या विडंबना है कि पिछले ही हफ्ते प्रधानमंत्री ने एक मीडिया संस्थान के समारोह को संबोधित करते हुए आपातकाल की याद दिलाई और यह दोहराया कि उनकी सरकार अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करती है। लेकिन इस आश्वासन के एक ही दिन बाद एनडीटीवी को नौ नवंबर को अपना प्रसारण बंद रखने का आदेश सुना दिया गया। इससे इस आरोप को बल मिला है कि यह सरकार असहमति और आलोचना को सहन नहीं कर पा रही है और किसी न किसी बहाने उसे कुचलने पर आमादा है। ऐसी धारणा बनने देना हमारे लोकतंत्र के लिए तो अशुभ संकेत है ही, सरकार की अपनी साख के लिए भी ठीक नहीं है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on November 7, 2016 5:07 am

सबरंग