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बर्लिन की राह

जर्मनी की कोई सोलह सौ कंपनियां भारत में काम कर रही हैं और करीब छह सौ जर्मन कंपनियां यहां साझा कारोबार और साझी परियोजनाओं में शामिल हैं।
Author May 31, 2017 04:52 am
पशु बिक्री रोक पर कांग्रेस ने साधा सरकार पर निशाना। (फाइल फोटो)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चार देशों की यात्रा का पहला मुकाम बर्लिन था। यों तो जर्मनी की चांसलर एंजला मर्केल से उनकी बातचीत दोनों देशों के बीच हर दो साल पर होने वाली द्विपक्षीय शिखर वार्ता की दूसरी कड़ी थी, पर कई कारणों से दोनों नेताओं की इस मुलाकात को ज्यादा बड़े परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा रहा है। दोनों देशों के बीच पहला अंतर-सरकारी विचार-विमर्श अक्तूबर, 2015 में नई दिल्ली में हुआ था। तब सारा जोर आपसी व्यापार बढ़ाने पर था। इस बार भी वह एक प्रमुख विषय था, और यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि यूरोपीय संघ में जर्मनी भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। इस मौके पर दोनों देशों के बीच आठ द्विपक्षीय समझौते हुए। भारत में विदेशी निवेश के मुख्य स्रोतों में जर्मनी भी है। जर्मनी की कोई सोलह सौ कंपनियां भारत में काम कर रही हैं और करीब छह सौ जर्मन कंपनियां यहां साझा कारोबार और साझी परियोजनाओं में शामिल हैं। लेकिन मोदी और एंजला की बातचीत में द्विपक्षीय कारोबार के अलावा और भी कई मुद््दे थे- जलवायु संकट से लेकर आतंकवाद तक।

जर्मनी अभी तक भारत को बढ़ते कारोबारी अवसरों के लिहाज से ही देखता रहा है। पर अब ऐसा लगता है कि भू-राजनीतिक दृष्टि से भी भारत के प्रति उसकी दिलचस्पी जगी है, शायद इसलिए कि इस वक्त दुनिया की बड़ी ताकतों के रिश्तों में अस्थिरता दिख रही है। ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर हो चुका है। डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद, जैसी कि आशंका थी, अमेरिका ने पेरिस जलवायु समझौते से किनारा करना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों जी-7 की बैठक के दौरान ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौते से पल्ला झाड़ने का संकेत देने के अलावा जर्मनी की व्यापार नीति की खुलेआम आलोचना भी की। चीन के साथ रूस की निकटता और बढ़ रही है। चीन के साथ जर्मनी को विपुल व्यापारिक संभावनाएं दिखती हैं, पर चीन की राजनीतिक व्यवस्था यूरोपीय मिजाज से मेल नहीं खाती। हाल में चीन ने अपनी महत्त्वाकांक्षी योजना वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) को लेकर बेजिंग में जो अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया था उसमें जर्मनी ने भी शिकरत की थी, जबकि भारत सीपीईसी यानी चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर पर अपने विरोध के कारण उस सम्मेलन से अलग रहा। लेकिन ओबीओआर को लेकर संशय यूरोप के कई और देशों के साथ-साथ जर्मनी में भी है। ऐसे में बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में भारत के प्रति जर्मनी का रुझान बढ़ना स्वाभाविक है।

अंतर-सरकारी शिखर बैठक के बाद साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि भारत और जर्मनी एक दूसरे के लिए बने हुए हैं, तो मर्केल ने भी भारत को भरोसेमंद साझेदार बताया। वर्ष 2015 में द्विवार्षिक अंतर-सरकारी शिखर बैठक की शुरुआत के साथ दोनों देशों ने आपसीरिश्तों को रणनीतिक स्तर पर ले जाने का इरादा जताया था। अब उसके लिए कहीं ज्यादा अनुकूल अवसर दिख रहा है और ऐसा लगता है कि इसका अहसास दोनों तरफ है। यूरोप अपने रणनीतिक उद््देश्यों के लिए हमेशा अमेरिका का मुंह जोहता रहा है और अमेरिका के वर्चस्व वाली सारी सामरिक संधियों में शामिल है। लेकिन ट्रंप के दूरंदेशी से रहित रवैए के कारण नए मित्र बनना तो दूर, पुराने मित्र भी खफा दिख रहे हैं। मर्केल का यह कहना गौरतलब है कि जर्मनी ब्रेक्जिट और ट्रंप के जमाने में ब्रिटेन और अमेरिका जैसे परंपरागत सहयोगियों पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकता। इसलिए आश्चर्य नहीं कि भारत अब जर्मनी को केवल बाजार के नजरिए से नहीं, बल्कि कूटनीतिक लिहाज से भी काफी अहम लगने लगा है।

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