ताज़ा खबर
 

जीएसटी की उलझन

यह जीएसटी का शुरुआती चरण है, इसलिए सरकार को विश्वास है कि जल्दी ही लोग इसकी उलझनों से पार पा जाएंगे और इसके फायदे नजर आने लगेंगे।
Author September 10, 2017 23:50 pm
जीएसटी को आजादी के बाद का सबसे बड़ा कर सुधार बताया जा रहा है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी परिषद की इक्कीसवीं बैठक में करों की समीक्षा करते हुए रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली करीब तीस वस्तुओं पर करों में कटौती की गई है। मध्यम और बड़ी कारों पर उपकर बढ़ाए गए हैं। छोटी कारों पर करों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। जिन उपभोक्ता वस्तुओं पर करों में कटौती की गई है उनमें सूखी इमली, खली, धूपबत्ती, प्लास्टिक के रेनकोट, रबड़बैंड, रसोई में इस्तेमाल होने वाले गैस लाइटर आदि शामिल हैं। इससे निस्संदेह उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिलेगी। इसकी भरपाई मंझोले आकार की कारों पर दो प्रतिशत, बड़ी कारों पर पांच प्रतिशत और एसयूवी पर सात प्रतिशत अतिरिक्त उपकर लगाने से हो सकेगी। सरकार का मानना है कि जीएसटी के तहत अभी तक कर संग्रहण काफी अच्छा रहा है। हालांकि अब भी जीएसटी को लेकर कारोबारियों की उलझन समाप्त नहीं हुई है। वित्तमंत्री का कहना है कि सत्तर प्रतिशत से अधिक करदाताओं ने पंचानबे हजार करोड़ रुपए का रिटर्न दाखिल किया है। बड़े कारोबारियों के लिए रिटर्न भरने की अवधि बढ़ा कर इकतीस अक्तूबर तक कर दी गई है।

जीएसटी की उलझनों को दूर करने और इसमें गड़बड़ी करने वालों पर नजर रखने के लिए मंत्रियों की एक निगरानी समिति बनाई गई है। यह समिति जीएसटी की राह में आने वाली मुश्किलों को दूर करने में मदद करेगी। पिछले महीने जीएसटी परिषद की बैठक में भी उन्नीस वस्तुओं और सेवाओं पर करों में कटौती की गई थी। दरअसल, सरकार को इस तरह बार-बार करों में बदलाव इसलिए करना पड़ रहा है कि शुरू में ही करों के निर्धारण को लेकर व्यावहारिकता नहीं बरती गई। यूपीए सरकार के समय जब जीएसटी की रूपरेखा बनी, तो तय किया गया था कि किसी भी हाल में करों का स्तर अठारह फीसद से ऊपर नहीं होगा, फिर राज्य सरकारों के सुझावों के मद्देनजर उसमें बढ़ोतरी की गई। मगर वर्तमान सरकार जीएसटी लागू करने की जल्दबाजी में करों के अधिकतम पैमाने को भुला बैठी। इसी का नतीजा है कि कई ऐसी चीजों पर करों की दर इतनी अधिक तय कर दी गई कि सामान्य कारोबारी और उपभोक्ता पर बोझ साबित होने लगा। इसलिए बार-बार समीक्षा करके करों में बदलाव करना पड़ता है।

वस्तुओं और सेवाओं पर करों का निर्धारण तार्किक न होने का नतीजा यह हुआ कि बहुत सारे कारोबारियों ने छोटी-मोटी वस्तुओं का अपने ब्रांड नाम से पंजीकरण रद्द कराना शुरू कर दिया। क्योंकि खुले में बिकने वाली वस्तुओं की अपेक्षा ब्रांड नाम से बिकने वाली वस्तुओं पर जीएसटी अधिक था। जाहिर है, बाजार में एक ही उपभोक्ता वस्तु की दो कीमतें हो गर्इं। मगर अब सरकार का कहना है कि भले कारोबारियों ने पंजीकरण रद्द करा लिया हो, पर उन पर जीएसटी पूर्ववत लगता रहेगा। इसी तरह कारों पर जीएसटी दर ट्रैक्टर और उसमें इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की अपेक्षा कम रखी गई थी। फसलों के भंडारण संबंधी सेवाओं पर जीएसटी अठाईस फीसद तक रखी गई थी। जीएसटी में ऐसी अनेक विसंगतियां अब भी मौजूद हैं। जब तक जीएसटी का स्वरूप सिर्फ बड़े उद्योगों और संपन्न वर्गों को केंद्र में रख कर बना रहेगा, छोटे और मंझोले कारोबारियों, आम उपभोक्ता की जरूरतों का ध्यान नहीं रखा जाएगा, इसकी उलझनें और बार-बार समीक्षाओं की जरूरत पड़ती रहेगी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग