March 24, 2017

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हार की जीत

2013 में दिल्ली विधानसभा के चुनाव में भी किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था, पर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी। तब उसने सरकार बनाने से इनकार कर दिया था। फिर कांग्रेस के समर्थन से आम आदमी पार्टी ने सरकार बनाई थी।

Author March 16, 2017 03:21 am
पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव के नतीजे 11 मार्च को आएंगे।

मणिपुर और गोवा में जिस तरह भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बनाई, उसे लेकर उचित ही अंगुलियां उठ रही हैं। हालांकि भाजपा का यह कदम असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता, पर सरकार बनाने की नैतिकता पर उठ रहे सवालों से वह बच नहीं सकती। इस बार पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों से भाजपा और मजबूत हुई है, पर वह मणिपुर और गोवा में सरकार बनाने की हड़बड़ी दिखाने के बजाय धैर्य से काम लेती तो उसका बड़प्पन जाहिर होता। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस पहले स्थान पर थी, हालांकि उसे बहुमत हासिल नहीं था। ऐसी स्थिति में अक्सर विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंका रहती है। इसलिए राज्यपाल उसी दल को सरकार बनाने को कहते हैं, जो अपना बहुमत साबित कर दे। इसी तकाजे को ध्यान में रख कर मणिपुर और गोवा के राज्यपालों ने भाजपा को सरकार बनाने का अवसर दिया। चुनाव नतीजे आते ही भाजपा सक्रिय हो गई थी और उसने सरकार बनाने का एलान करते हुए अन्य दलों के विधायकों को अपने साथ जोड़ लिया था। हालांकि नैतिक तकाजा यह था कि वह बड़ी पार्टी होने के नाते पहले कांग्रेस को सरकार बनाने का दावा पेश करने देती और उसकी कोशिश होती कि दूसरे दलों के विधायकों को कांग्रेस के पाले में जाने से रोके। जब वह बहुमत साबित करने में विफल होती तो भाजपा सरकार बनाने का दावा पेश करती। मगर शायद उसे आशंका रही होगी कि कहीं कांग्रेस सरकार बना न ले।

छोटे राज्यों में कई बार किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत न मिलने पर ऐसी स्थिति आ चुकी है। 2013 में दिल्ली विधानसभा के चुनाव में भी किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था, पर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी। तब उसने सरकार बनाने से इनकार कर दिया था। फिर कांग्रेस के समर्थन से आम आदमी पार्टी ने सरकार बनाई थी। उसी तरह मणिपुर और गोवा में भाजपा को पहले कांग्रेस को मौका देना चाहिए था। गोवा में तो उसके मुख्यमंत्री भी चुनाव हार गए, इसलिए उसे जनादेश का सम्मान करना चाहिए था। यह सही है कि वहां उसे दूसरे दलों का समर्थन आसानी से मिल जाता, पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नजरअंदाज करते हुए उसने सरकार बनाने की हड़बड़ी दिखाई, इसलिए उसके खिलाफ विपक्षी दलों को यह कहने का मौका मिल गया कि उसने जीत चुरा ली है या विधायकों की खरीद-फरोख्त की गई है। हालांकि इस तरह सरकार बनाने का चलन नया नहीं है। जब कांग्रेस केंद्र में ताकतवर पार्टी हुआ करती थी, तो उसने भी कई बार इसी तरह सरकार बनाई। यहां तक कि बनी-बनाई सरकार में तोड़-फोड़ करके अपनी सरकार बनाने का प्रयास किया। विधायकों का समर्थन हासिल करने के लिए उन्हें महत्त्वपूर्ण पद या दूसरे तरीकों से लाभ पहुंचाने का चलन भी नया नहीं है। अगर कांग्रेस को इन दोनों राज्यों में सरकार बनाने का न्योता भेजा जाता, तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह भी अन्य विधायकों को इसी तरह प्रभावित करने की कोशिश करती। लोकसभा चुनाव के पहले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कांग्रेस मुक्त भारत का नारा रहा है। इसलिए अरुणाचल और उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार में तोड़-फोड़ करके भाजपा ने अपनी सरकार बनवाने का भी प्रयास किया। उसमें भाजपा को काफी किरकिरी झेलनी पड़ी। हालांकि मणिपुर और गोवा में उसके सरकार बनाने को चुनौती नहीं दी जा सकती, पर यह तो साफ है कि कांग्रेस मुक्त भारत बनाने की हड़बड़ी यहां भी दिखाई गई।

 

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First Published on March 16, 2017 3:21 am

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