June 25, 2017

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लंदन में आग

देखते ही देखते चौबीस मंजिला ग्रेनफेल टॉवर धू-धू कर जलने लगा, जिसमें अब तक आधा दर्जन लोगों की झुलसने से मौत हो गई और चार दर्जन से ज्यादा लोग अस्पतालों में इलाज के लिए भर्ती कराए गए हैं।

Author June 15, 2017 05:38 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

आग जंगल में लगे या मैदान में, झोपड़ी में लगे या राजमहल में, उसका काम है चीजों को भस्म करना। उसके सामने इंसान, जानवर, लकड़ी-पत्थर सब बराबर हैं। मंगलवार की रात आग ने पश्चिमी लंदन में वही किया, जिसके लिए वह जानी जाती है। देखते ही देखते चौबीस मंजिला ग्रेनफेल टॉवर धू-धू कर जलने लगा, जिसमें अब तक आधा दर्जन लोगों की झुलसने से मौत हो गई और चार दर्जन से ज्यादा लोग अस्पतालों में इलाज के लिए भर्ती कराए गए हैं। लंदन के समय के हिसाब से आग रात डेढ़ बजे तब लगी, जब लोग सो रहे थे। बीबीसी के एक संवाददाता का कहना था कि उसने जब टॉवर को देखा तो वह पूरा दहक रहा था और खतरा यही है कि कहीं वह ढह न जाए। मलबा टूट कर गिर रहा था और कांच के टूटने और चटखने की तेज आवाजें आ रही थीं। अनुमान है कि आग दूसरी मंजिल पर स्थित किसी फ्लैट में लगी, फिर पूरी इमारत में फैल गई। मृतकों और घायलों की संख्या की सही जानकारी स्थानीय अधिकारी अभी एकत्र नहीं कर पाए हैं।

आग लगने की वजह तत्काल पता नहीं लगी है, लेकिन मौके पर दो सौ दमकलकर्मियों की अच्छी-खासी पलटन फंसे हुए लोगों को बचाने और आग को काबू करने के लिए लगाई गई है। एक प्रत्यक्षदर्शी ने लोगों को चीखते-चिल्लाते और अपने बच्चों और परिजनों को खिड़कियों से बाहर निकालते और कूदते-फांदते देखा। टॉवर में 120 फ्लैट हैं। यों तो इसका निर्माण 1974 में हुआ था, लेकिन 2016 में इसका पुनरुद्धार कराया गया था। लंदन के मेयर सादिक खान ने कहा है कि टॉवर में आग कैसे लगी, इसका जवाब जरूर तलाशा जाएगा। क्योंकि, इस इमारत को लेकर असुरक्षा की आशंका पहले भी जताई गई थी। एक स्थानीय ग्रेनफेल एक्शन ग्रुप ने दावा किया है कि उसने संबंधित अधिकारियों को आग के खतरे के प्रति आगाह किया था। लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। गौरतलब है कि एक तरफ सारी दुनिया में गगनचुंबी इमारतें खड़ी करने की होड़ लगी हुई है। ऊंची-ऊंची इमारतें, आसमान चूमते टॉवर किसी भी देश की तरक्की और शानो-शौकत के पैमाना बनते जा रहे हैं। यह घटना उस देश में हुई है, जहां मकानों-दुकानों के निर्माण और सुरक्षा के लिए कड़े कानून हैं। इंग्लैंड में 1947 के पहले भवन-निर्माण संबंधी कानूनों को लागू करने की जिम्मेदारी सरकार के पास थी, लेकिन बाद में इसे स्थानीय प्रशासन को सौंप दिया गया। इस आगजनी में चूक कहां हुई, इसका विस्तृत ब्योरा तो शायद जांच के बाद सामने आएगा।

लेकिन यह सवाल जरूर एक बार फिर उछल कर सामने आ गया है कि आखिर ऊंची इमारतें कितनी सुरक्षित हैं? अगर इतने विकसित देश और शहर में सुरक्षा मानकों में ऐसी चूक रह सकती है तो अपेक्षया अविकसित और पिछड़े मुल्कों की हालत क्या होगी ! विशेषज्ञों का हमेशा से मानना रहा है कि इमारत जितनी ऊंची होगी, उसके सुरक्षा मानक उतने ही संवेदनशील होंगे। कहने की जरूरत नहीं कि दुनिया के सभी बड़े शहर जमीन की तंगी से परेशान हैं और आवासीय जरूरतों को पूरा करने के लिए आसमान में फैलाव ही एकमात्र विकल्प बचा हुआ है। सारी दुनिया में बढ़ते शहरीकरण के लिए अपनी आबादी को समेटने का आखिर और रास्ता भी क्या है ? मगर, यह देखना भी जरूरी है कि कहीं यह वरदान, अभिशाप न बन जाए। ग्रेनफेल टॉवर की आग सिर्फ किसी चूक का नतीजा है या विकास के सिद्धांत को अपनाने में ही कहीं कुछ गड़बड़ हुई है?

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First Published on June 15, 2017 5:32 am

  1. M
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    Jun 15, 2017 at 9:01 am
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