March 30, 2017

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संपादकीय: बंधक कलम

आतंकवाद के मसले पर दुनिया भर में अलग-थलग पड़ते पाकिस्तान के शासकों को अपनी जवाबदेही की फिक्र शायद कम है।

Author October 12, 2016 04:32 am
पाकिस्तान।

आतंकवाद के मसले पर दुनिया भर में अलग-थलग पड़ते पाकिस्तान के शासकों को अपनी जवाबदेही की फिक्र शायद कम है। वे इसे लेकर ज्यादा फिक्रमंद नजर आ रहे हैं कि पाकिस्तान में सरकार और सेना के बीच गोपनीय बैठकों में उभरने वाले द्वंद्व की खबरें किसी तरह दबी-ढंकी रहें। शायद इसीलिए अब वहां पत्रकारों को निशाने पर लेने की कोशिश हो रही है। इस क्रम में पहली गाज मशहूर अखबार ह्यडॉनह्ण के एक रिपोर्टर सिरिल अलमीडा पर गिरी है, जिन्हें एक खबर के लिए जिम्मेदार मान कर पाकिस्तान की ईसीएल यानी एक्जिट कंट्रोल लिस्ट में डाल दिया गया है। यानी अब वे सरकार की इजाजत के बिना पाकिस्तान से बाहर नहीं जा सकते।

गौरतलब है कि पाकिस्तान में एक्जिट कंट्रोल लिस्ट अध्यादेश के तहत इस सूची में शामिल किए गए लोगों को देश से बाहर जाने से रोका जा सकता है। सिरिल अलमीडा का कसूर बस यह है कि उन्होंने अपने स्रोतों के जरिए भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान सरकार और वहां की सेना के बीच हुई बैठक की कुछ खबरें निकाल लीं। उस बैठक में सरकार ने सैन्य नेतृत्व को आतंकवाद के कथित समर्थन की वजह से पाकिस्तान के दुनिया भर में अलग-थलग पड़ते जाने की बात कही थी। सिरिल अलमीडा ने किसी तरह इस खबर को अखबार के जरिए दुनिया भर में आम कर दिया। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि जम्मू-कश्मीर के उड़ी में आतंकी हमले के बाद भारत के सख्त रुख और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक कवायदों की वजह से अपने ऊपर उठने वाले सवालों का जवाब देना पाकिस्तान के लिए मुश्किल हो रहा था और इस मसले पर वास्तव में उसके अलग-थलग पड़ने के हालात सामने थे? फिर इस खबर में क्या नया था?

जब सिरिल पर नियंत्रण के फैसले ने तूल पकड़ लिया तब पाकिस्तान के एक मंत्री ने सफाई देते हुए कहा कि डॉन में छपी रिपोर्ट से विदेश नीति पर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के हाथ बंधे होने के अलावा चुनी हुई सरकार और सेना के बीच मतभेद होने का संकेत गया; राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी ऐसी बैठक का ब्योरा बाहर नहीं आना चाहिए। सवाल है कि अगर एक पत्रकार ने अपने पेशेवर रुख का परिचय देते हुए तटस्थ भाव से खबर को लोगों तक पहुंचाया, तो इसमें क्या गलत है? किसी भी देश की राजनीतिक सत्ता अगर पत्रकारों को नियंत्रित या संचालित करने लगती है तो वहां पत्रकारिता खत्म हो जाती है। सरकार के पक्ष में नियंत्रित पत्रकारिता आखिरकार न्याय और आम जनता की विरोधी हो जाती है। काम के दौरान पत्रकारों के सामने पैदा होने वाले जोखिम के मद््देनजर पाकिस्तान को पहले ही दुनिया का सबसे खतरनाक देश माना जाता है। पाकिस्तान सरकार की कोशिश यह होनी चाहिए थी कि

आतंकवादी गिरोहों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करके वह दुनिया का भरोसा हासिल करे। पर इस तकाजे को पूरा करने के बजाय वह पत्रकारों पर पाबंदियां लगा कर खबरों की सीमा तय कर रही है। लेकिन पत्रकार की कलम और पत्रकारिता को बंधक बना कर हकीकत को छिपाने की कोशिश तमाम तकनीकी संसाधनों और असीमित संचार के दौर में शायद ही संभव हो पाए। नंद उठा सके। लेकिन गांधी को हमने कितना स्वीकार किया है! मानवकेंद्रित विचारों की हकीकत की जिंदगी में अवहेलना के बाद सोचने को मजबूर होना पड़ता है कि क्या विचारधाराएं सिर्फ किताबी सोच के लिए होती हैं। उदारीकरण की भूल-भुलैया में मौजूदा सत्तातंत्र की राजनीति जिस तरह घूम रही है, उससे तो ऐसा ही लगता है! श्रम की चक्कीाने को मजबूर होना पड़ता है कि क्या विचारधाराएं सिर्फ किताबी सोच के लिए होती हैं। उदारीकरण की भूल-भुलैया में मौजूदा सत्तातंत्र की राजनीति जिस तरह घूम रही है, उससे तो ऐसा ही लगता है!

 

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First Published on October 12, 2016 4:31 am

  1. V
    vinod
    Oct 12, 2016 at 4:07 pm
    उक्त संपादकीय की अंतिम कुछ पंक्तियाँ मूल पाठ से मेल नहीं खा रहीं हैं ।कृपया जाँच लें ।धन्यवाद ।।।
    Reply

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