March 27, 2017

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महंगाई के संकेत

ताजा आंकड़ों के मुताबिक फरवरी में खनिज की कीमतों में इकतीस फीसद और र्इंधन की कीमतों में इक्कीस फीसद की बढ़ोतरी हुई है।

Author March 15, 2017 04:41 am
महंगाई की मार

मंगलवार को खबर आई कि विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को मिली जबर्दस्त कामयाबी पर शेयर बाजार ने काफी उत्साहजनक प्रतिक्रिया दर्शाई, मुंबई के संवेदी सूचकांक में एक ही रोज में सैकड़ों अंकों का इजाफा हुआ। इस प्रतिक्रिया को समझना मुश्किल नहीं है। दरअसल, निवेशकों को लगा होगा कि अब राज्यसभा में भाजपा की मुश्किलें कम होंगी और बाजार-केंद्रित आर्थिक सुधार के कदमों में तेजी आएगी। लेकिन इसी दिन अर्थव्यवस्था की बाबत एक और खबर आई जो चिंताजनक ही कही जाएगी। खबर यह कि थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई का ग्राफ फरवरी में चढ़ गया। यों मुद्रास्फीति की दर में थोड़ा-बहुत उतार-चढ़ाव होता रहता है। पर ताजा आंकड़े की खास बात यह है कि डब्ल्यूपीआइ यानी थोक महंगाई सूचंकाक उनतालीस महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की तरफ से जारी किए गए ताजा आंकड़ों के मुताबिक फरवरी में थोक मूल्य सूचकांक 6.55 फीसद पर पहुंच गया, जो कि इससे पहले के महीने यानी जनवरी में 5.25 फीसद था। सबसे ज्यादा वृद्धि खनिज, र्इंधन और ऊर्जा के मामले में हुई है, पर खाद्य पदार्थों की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी का रुझान दिखा है।

ताजा आंकडे क्यों चिंताजनक है इसका अंदाजा फकत इस एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि महज तीन महीने पहले, दिसंबर 2016 में थोक महंगाई सूचकांक (संशोधित अनुमान के मुताबिक) सिर्फ 3.68 फीसद पर था। ताजा आंकड़ों के मुताबिक फरवरी में खनिज की कीमतों में इकतीस फीसद और र्इंधन की कीमतों में इक्कीस फीसद की बढ़ोतरी हुई है। जहां तक खाद्य पदार्थों की बात है, जनवरी में इनकी कीमतों में 0.56 फीसद की कमी दर्ज हुई थी, मगर फरवरी में 2.69 फीसद की तेज बढ़ोतरी हुई है। यह एकदम अप्रत्याशित नहीं है। रिजर्व बैंक ने कोई सवा महीने पहले जब पिछली मौद्रिक समीक्षा जारी की थी, तो बहुत-से लोगों की उम्मीदों के विपरीत उसने रेपो दरों में कोई कटौती नहीं की। उसे आशंका थी कि कीमतें चढ़ सकती हैं। इसके पीछे यह अनुमान काम कर रहा था कि नोटबंदी की वजह से मांग धीमी पड़ी है, जिससे कीमतें ठहरी हुई हैं, या किसी-किसी मामले में कुछ नीचे भी आई हैं; जैसे ही क्रय-विक्रय सामान्य होगा, कीमतें चढ़ सकती हैं। दूसरे, उसे लग रहा था कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन का असर अभी पूरी तरह से उजागर नहीं हुआ है, आगे इसका असर कीमतों में बढ़ोतरी ही लाएगा। रिजर्व बैंक की आशंका अब सही साबित होती दिख रही है।

नोटबंदी के बाद कुछ दिनों तक महंगाई से राहत का जो आभास दिया जा रहा था उसकी कृत्रिमता अब सामने आने लगी है। यह भी गौरतलब है कि आम लोग रोजाना जो दंश बाजार में महसूस करते हैं उसका ठीक अंदाजा थोक मूल्य सूचकांक से नहीं हो सकता, क्योंकि उनका वास्ता थोक बाजार से नहीं, खुदरा बाजार से होता है और खुदरा महंगाई दर हमेशा थोक महंगाई दर से ज्यादा होती है। अगर थोक मूल्य सूचकांक फरवरी में करीब साढ़े छह फीसद पर पहुंच गया, तो जब उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित आंकड़े आएंगे, तो कैसी तस्वीर उभरेगी इसका थोड़ा-बहुत अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। अब एक बार फिर रिजर्व बैंक को इस मुश्किल सवाल से जूझना होगा कि नीतिगत दरों में कटौती की जाए या नहीं। रिजर्व बैंक जो करे, पर यह बार-बार का अनुभव है कि मौद्रिक नीति की अपनी सीमाएं हैं। महंगाई से निपटने की ज्यादा उम्मीद रिजर्व बैंक से नहीं, सरकार से की जानी चाहिए।

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First Published on March 15, 2017 4:41 am

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