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सहयोग का संचार

सार्क के आठ सदस्य देशों में से सात यानी भारत, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और मालदीव इस परियोजना का हिस्सा हैं।
Author May 8, 2017 04:20 am
ISRO Satellite: इससे पहले एक बार में सबसे ज्यादा 37 सैटलाइट्स स्पेस में भेजने का रिकॉर्ड रूस के नाम था।

दक्षिण एशिया संचार उपग्रह अंतरिक्ष अनुसंधान तथा तकनीक के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक और उदाहरण है। यह भी कहा जा सकता है कि यह उम्दा कूटनीति की एक मिसाल है। यह उपग्रह एक तरह से सार्क के अन्य सदस्य देशों को भारत का तोहफा है। सार्क के आठ सदस्य देशों में से सात यानी भारत, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और मालदीव इस परियोजना का हिस्सा हैं। और, सफल प्रक्षेपण की खबर आते ही इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने जिस तरह खुशी का इजहार करते हुए भारत का शुक्रिया अदा किया उससे उपग्रह से जुड़ी कूटनीतिक कामयाबी का संकेत मिल जाता है। सिर्फ पाकिस्तान इस परियोजना का हिस्सा नहीं है। वह इस परियोजना से पहले ही अलग हो गया था, यह कहते हुए कि उसे इसकी जरूरत नहीं है, अंतरिक्ष तकनीक में वह खुद सक्षम है। लेकिन अब उसने अपने अलग रह जाने का दोष भारत पर मढ़ दिया है, यह कह कर कि भारत परियोजना को साझा तौर पर आगे बढ़ाने को राजी नहीं था। पर इस आरोप में दम नहीं दिखता। सार्क के बाकी सदस्य देशों की शिरकत यह बताने के लिए काफी है कि भारत ने आपसी सहयोग की भावना से ही पहल की और उसे आगे बढ़ाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में यह पेशकश की थी कि भारत ऐसा उपग्रह प्रक्षेपित करेगा जिसके आंकड़े सार्क के सभी सदस्य देशों से साझा किए जाएंगे। आखिर बीते शुक्रवार को वह वादा पूरा हो गया, जब इसरो ने दक्षिण एशिया संचार उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया।

इसरो यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के नवीनतम संचार उपग्रह ‘जीसैट-9’ को एसएएस रोड पिग्गीबैक कहा जाता है। जीसैट-9 दो हजार दो सौ तीस किलोग्राम की वहन क्षमता वाला भूस्थैतिक संचार उपग्रह है। यह केयू बैंड में दक्षिण एशियाई देशों को टेली-कम्युनिकेशन, टेलीविजन, डीटीएच, वीसैट, टेली शिक्षा व टेली मेडिसिन जैसी विभिन्न संचार सेवाएं मुहैया कराएगा। यह बाढ़, सुनामी, भूकम्प और चक्रवात जैसी आपदा की स्थितियों में बेहतर प्रबंधन में मददगार होगा। तकनीक के लिहाज से देखें तो इस उपग्रह में कुछ नया नहीं है। ऐसे कई उपग्रह भारत प्रक्षेपित कर चुका है। इनसैट की सीरिज ही इस तरह की थी, जिस सीरिज का आखिरी उपग्रह 2007 में प्रक्षेपित किया गया। अब तो जीसैट सीरिज के उपग्रहों का दौर है, जो देश में बहुत तरह की सेवाएं मुहैया करा रहे हैं। लिहाजा, दक्षिण एशिया संचार उपग्रह यानी जीसैट-9 में कुछ अपूर्व है तो यही कि पहली बार, पाकिस्तान के अपवाद को छोड़ कर, दक्षिण एशिया के देश एक पांत में बैठ कर अंतरिक्ष तकनीक के फल खाएंगे। अलबत्ता इस परियोजना का खर्च केवल भारत उठाएगा।

अंतरिक्ष कार्यक्रम में यों भी दक्षिण एशिया के ज्यादातर देशों की कोई खास गति नहीं है। जबकि भारत की गिनती दुनिया के उन देशों में होती है जो अंतरिक्ष अनुसंधान में अव्वल हैं। इसरो की सेवाएं लेने में अब कई विकसित देश भी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। सार्क की हालत ठीक नहीं है। सार्क की मुहर लगने के बाद प्रक्षेपण होना होता, तो क्या पता अब तक न हो पाता। पर इसरो की काबिलियत का एक कुशल कूटनीतिक उपयोग कर भारत ने दक्षिण एशिया में आपसी सहयोग का पैगाम दिया है। अलबत्ता अंतरिक्ष कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का सबसे बड़ा उदाहरण यूरोपीय स्पेस एजेंसी का है जिसमें बीस से ज्यादा देश शामिल हैं।

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