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संपादकीय: जी-20 के सामने

चीन के हांगझाउ शहर में हुए जी-20 के ताजा शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि दक्षिण एशिया में एक अकेला देश आतंक के एजेंट फैला रहा है।
Author September 7, 2016 06:02 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी20 देशों की समिट में आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्‍तान पर हमला बोला। (Photo:PTI)

भारत को इस बात का संतोष हो सकता है कि उसने सीमापार आतंकवाद का मसला उठाने के लिए जी-20 और ब्रिक्स के मंच का इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन जी-20 के ताजा सम्मेलन को समग्रता में देखें तो यह बिना किसी खास निर्णय के समाप्त हो गया। चीन के हांगझाउ शहर में हुए जी-20 के ताजा शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि दक्षिण एशिया में एक अकेला देश आतंक के एजेंट फैला रहा है। इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आतंकवाद को प्रायोजित करने वालों को प्रतिबंधित और अलग-थलग किया जाना चाहिए। इससे ऐन पहले, ब्रिक्स की बैठक में भी मोदी ने आतंकवाद का मुद््दा जोर-शोर से उठाते हुए कहा था कि आतंकवादी संगठनों के पास न कोई बैंक है न हथियारों की फैक्टरी; फिर वे वित्तीय मदद और हथियार कहां से पाते हैं! जाहिर है, उन्हें यह औरों से हासिल होता है। आतंकवाद के ऐसे मददगारों व प्रायोजकों को अलग-थलग किए जाने की जरूरत है। इसमें दो राय नहीं कि इन दोनों वक्तव्यों का इशारा साफ तौर पर पाकिस्तान की तरफ था। इस तरह बिना पाकिस्तान का नाम लिए, मोदी ने तीन दिनों में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को लगातार घेरने की कोशिश की।

यहां तक कि संकेतों में उन्होंने चीन को भी नहीं बख्शा, जब उन्होंने कहा कि आतंकवाद को राजनीतिक हितों के हिसाब से नहीं देखा जाना चाहिए। दूसरा मसला जो मोदी ने जी-20 की बैठक में प्रमुखता से उठाया वह काले धन का था। उन्होंने जी-20 के नेताओं से कहा कि वे आर्थिक अपराधियों के लिए सुरक्षित पनाहगाहें और अत्यधिक बैंकिंग गोपनीयता खत्म करें। सवाल है कि क्या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस तरह का आह्वान पर्याप्त है? यह सही है कि कई देशों में गुप्त खातों की सुविधा ने दुनिया भर में काले धन की समस्या को बढ़ाया है। लेकिन जब गोपनीयता से परदा उठ जाता है तब भी क्या कार्रवाई होती है, यह पनामा पेपर्स के खुलासों ने बता दिया है।

काले धन का स्रोत देश के भीतर ही है। उसके प्रवाह तथा प्रक्रियाओं का पता आय कर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय से लेकर तमाम भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों को रहता है। लिहाजा, काले धन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गरजने से बेहतर होगा कि देश के भीतर कार्रवाई पर ध्यान दिया जाए। जहां तक जी-20 के ताजा सम्मेलन की सफलता का प्रश्न है, यह बिना किसी नए और बड़े फैसले के समाप्त हो गया। चीन के हांगझाउ शहर में यह जी-20 का ग्यारहवां सम्मेलन था। किसी एशियाई देश में हुआ तीसरा सम्मेलन। एशिया में जी-20 की पहली बैठक 2010 में दक्षिण कोरिया में हुई थी। इस समूह का पहला सम्मेलन 2008 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की पहल का नतीजा था। उस समय दुनिया भर में फैल रही मंदी से उबरने के तकाजे से उन्होंने बीस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक बुलाई थी। अपने इस मकसद में यह पहल काफी हद तक सफल रही। वैश्विक वित्तीय स्थिरता को ध्यान में रख कर कई निर्णय लिये गए और कुछ सालों तक साझा प्रयास भी चले। पर अब जी-20 का कोई संयुक्त उद्यम नहीं दिखता। क्या इसलिए कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने अब वैसा कोई गंभीर संकट नहीं है जिसने आठ साल पहले विकसित और विकासशील, दोनों खेमों के प्रमुख देशों को एकजुट किया था?

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