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कठघरे में मशीन

भारत में 2009 में लोकसभा चुनावों के बाद खुद भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने इवीएम के जरिए हुए मतदान के नतीजों पर सवाल उठाए थे।
Author March 16, 2017 03:34 am
(फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नतीजों की घोषणा के बाद एक बार फिर इवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन संदेह के कठघरे में है। बसपा को जहां उम्मीद थी कि राज्य में उसकी सरकार बनेगी, उसे महज उन्नीस सीटें मिल सकीं। फिर जब ऐसी खबरें आर्इं कि उत्तर प्रदेश के कुछ मुसलिम बहुल इलाकों में भी भाजपा के उम्मीदवारों ने भारी अंतर से जीत हासिल की है, तो बसपा प्रमुख मायावती ने शक जाहिर किया कि ये नतीजे स्वाभाविक नहीं हैं, इनमें इवीएम के जरिए मतों की हेराफेरी की गई है। उन्होंने यहां तक चुनौती दी कि अगर नतीजे सही हैं तो बैलेट पेपर से दोबारा चुनाव करा लिया जाए। दूसरी ओर, अपेक्षित नतीजे न मिलने के बाद सपा की ओर से भी मायावती के आरोपों का समर्थन करते हुए जांच की मांग की गई। इसके अलावा, पंजाब के नतीजों में पिछड़ने के बाद आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने इवीएम को लेकर संदेह जताया और दिल्ली में होने वाले नगर निगम चुनाव को बैलेट पेपर से कराने की मांग की। लेकिन निर्वाचन आयोग ने कानूनी बाध्यता और इवीएम के पूरी तरह सुरक्षित होने का हवाला देते हुए इस मांग को मानने से इनकार कर दिया।
हालांकि इवीएम से सुरक्षित और स्वच्छ मतदान को लेकर आशंकाएं पहले से जताई जाती रही हैं। कई तकनीकी विशेषज्ञों का भी मानना है कि इन मशीनों के जरिए परिणामों में बदलाव किए जा सकते हैं। दुनिया के कई विकसित देशों में भी इवीएम पर पाबंदी है और मतपत्र से चुनाव होते हैं।

भारत में 2009 में लोकसभा चुनावों के बाद खुद भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने इवीएम के जरिए हुए मतदान के नतीजों पर सवाल उठाए थे। सुब्रमण्यम स्वामी ने इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी और भाजपा प्रवक्ता जीवीएल नरसिंह राव ने इवीएम को लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताते हुए एक किताब भी लिखी। मगर इस बार अगर भाजपा को इवीएम में कोई दोष नजर नहीं आ रहा। यह दरअसल उसी तरह है कि जिन पार्टियों को चुनावों में हार मिली, उन्होंने इवीएम में घोटाले की आशंका जाहिर की, पर अपनी जीत के बाद उन्हें वही सही लगा। जो हो, इस बीच अगर समय-समय पर कई हलकों से विशेषज्ञों और अमूमन सभी पार्टियों की ओर से इवीएम को कठघरे में खड़ा किया गया है, तो यह अपने आप में उस भरोसे पर सवाल है, जिसके बूते लोकतंत्र टिका रहता है। इसलिए जरूरत है कि चुनाव आयोग इस मसले पर चुप्पी या किसी तरह के टालमटोल के बजाय ऐसी व्यवस्था करने का आश्वासन दे कि इवीएम से मतदान और उसके नतीजे पूरी तरह निर्दोष हैं। यह इसलिए भी जरूरी है कि मतदान से चुने गए प्रतिनिधि ही आखिर देश चलाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में ही इस मसले पर दायर मुकदमे में फैसला देते हुए कहा था कि इवीएम पर लोगों का भरोसा तभी बहाल किया जा सकता है जब हर वोट की पर्ची निकालने की व्यवस्था हो। इन पर्चियों को मतपेटियों में सुरक्षित रखा जाए, ताकि विवाद की स्थिति में दोबारा गिनती हो सके। मगर अफसोस की बात यह है कि करीब चार साल पहले का सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज भी सिर्फ आंशिक रूप से अमल में आ सका है। यही वजह है कि हर चुनाव के बाद किसी न किसी पक्ष को इवीएम से वोटिंग पर सवाल उठाने का मौका मिल जाता है।

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