December 08, 2016

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सिमी की साजिश

कुछ घंटों बाद मुठभेड़ में मार गिराए जाने से पहले उन्होंने पंद्रह किलोमीटर का रास्ता तय कर लिया था।

Author November 1, 2016 05:31 am
एनकाउंटर में ढेर सिमी का एक सदस्य। (Photo By Rajesh Chaurasia)

भोपाल केंद्रीय कारागार से भागे आठों कैदियों को उसी दिन पुलिस ने ढेर कर सिमी की साजिश नाकाम कर दी। यह निश्चय ही भोपाल पुलिस की एक उल्लेखनीय कामयाबी है। लेकिन यह प्रकरण एक बार फिर हमारी जेलों की सुरक्षा-व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाता है। जिस जेल से ये कैदी भागे वह राज्य की सबसे सुरक्षित जेल मानी जाती है और वहां चौबीसों घंटे इलेक्ट्रॉनिक निगरानी की व्यवस्था है। फिर, ये कोई साधारण कैदी नहीं थे। उन पर आतंकवादी गतिविधियों, राजद्रोह और डकैती के आरोपों में मुकदमे चल रहे थे। यही नहीं, उनका वास्ता एक ऐसे संगठन से था जो खतरनाक कामों में लिप्त पाए जाने की वजह से बरसों से प्रतिबंधित है। ये कैदी भागने की योजना बनाने और उसे अंजाम देने में कैसे सफल हो गए? खबर है कि उन्होंने भागने का रास्ता साफ करने के लिए एक कांस्टेबल की गला रेत कर हत्या कर दी और बिछाने या ओढ़ने की चादरों से रस्सी का काम लेकर दीवार पर चढ़ गए और जेल के बाहर हो गए।

कुछ घंटों बाद मुठभेड़ में मार गिराए जाने से पहले उन्होंने पंद्रह किलोमीटर का रास्ता तय कर लिया था। भागने के लिए उन्होंने दिवाली की रात का चुनाव किया, जब वातावरण पटाखों के धुएं से भरा रहता है और बाकी सारी आवाजें पटाखों के शोर में डूब जाती हैं। लोगों का ध्यान पूरी तरह त्योहार की तरफ रहता है। लेकिन भागे और फिर मार गिराए गए कैदियों के शातिरपने का हवाला देकर क्या जेल की सुरक्षा-व्यवस्था की खामियों पर परदा डाला जा सकता है? जेल अधीक्षक समेत कई अधिकारी और तीन सुरक्षाकर्मी निलंबित कर दिए गए हैं और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी करेगी। लेकिन मध्यप्रदेश में इस तरह की यह पहली घटना नहीं है।

दूर अतीत में न भी जाएं, हाल ही में खंडवा जेल में भी तीन कैदियों ने ऐसे ही वाकये को अंजाम दिया था, और उन पर भी बैंक डकैती के अलावा आतंकवादी गतिविधियों के आरोप थे। ताजा मामले ने एक बार फिर सिमी की खतरनाक गतिविधियों की याद ताजा कर दी है। अप्रैल, 1977 में वजूद में आए सिमी ने कुछ समय तक एक इस्लामी छात्र संगठन का चोला धारण किया हुआ था और जमात-ए-इस्लामी हिंद की छात्र शाखा माना जाता था। लेकिन कई मामलों में सिमी ने अपने रुख से जमात को नाराज कर दिया और दोनों के रास्ते अलग हो गए। मसलन, सिमी यासर अरफात को पश्चिम की कठपुतली मानता था और 1981 में उनके भारत आने पर उन्हें काले झंडे भी दिखाए थे। जबकि जमात की निगाह में अरफात फिलस्तीनियों के संघर्ष के नायक थे।

लोकतंत्र, संविधान और धर्मनिरपेक्षता को इस्लाम के खिलाफ और जिहाद को अपना रास्ता मानने वाला सिमी शुरू से एक कट््टरपंथी संगठन था, पर धीरे-धीरे वहीं तक सीमित न रह कर आतंकवादी गुटों खासकर इंडियन मुजाहिदीन से नाता जोड़ बैठा। यही नहीं, खुद सिमी के लोग कई वारदातों के सिलसिले में पकड़े गए। अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड टॉवर पर आतंकी हमले के कुछ ही रोज बाद सितंबर 2001 में सिमी पर प्रतिबंध लगा। तब से एक बार कुछ दिनों के अपवाद को छोड़ कर उस पर लगी पाबंदी कायम रही है। उस पर लगे प्रतिबंध को सर्वोच्च अदालत ने भी सही ठहराया था और एक विशेष न्यायाधिकरण ने भी। बहरहाल, भोपाल जेल की यह घटना सारे जेल प्रशासन के लिए सबक बननी चाहिए।

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First Published on November 1, 2016 5:31 am

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