January 23, 2017

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संपादकीय: अर्थव्यवस्था की सूरत

भारत जैसे देश में इन दिनों ‘अल्कोहलिक’ यानी आदतन शराब पीने वालों की तर्ज पर लोगों के ‘वर्कोहलिक’ यानी काम को नशे की तरह करने वाला होने की उम्मीदें बढ़ गई हैं।

Author October 12, 2016 04:27 am
भारत अब लगातार वैश्विक अर्थव्यवस्था और वैश्विक तंत्र का अभिन्न हिस्सा बनता जा रहा है। (express Photo)

हमें शायद यह पता भी नहीं हो कि हर साल अगर पूरे मनोयोग से भी काम करते हैं, कंपनी या सरकारी दफ्तर को लेकर हमारी निष्ठा बनी रहती है, हमारे नियोक्ता भी बेहतर हैं, इसके बावजूद हमें हर साल अड़तीस दिनों का वेतन नहीं मिलता। यह चौंकने वाली बात है, लेकिन हकीकत यही है। ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने इस बारे में दुनिया के कुछ बेहतरीन नियोक्ताओं के यहां काम करने वाले लोगों के कामकाज के तरीके के अध्ययन के बाद यह रिपोर्ट जारी की है। आखिर कैसे निष्ठावान व्यक्ति को भी हर साल कम से कम अड़तीस दिनों का वेतन कम मिलता है। दरअसल, ऐसा कर्मचारी आमतौर पर सत्रह मिनट पहले काम करना शुरू करता है और पंद्रह मिनट देरी तक काम करता रहता है।

कई तो इससे भी ज्यादा देर तक काम करते रहते हैं। प्रतियोगिता के दौर में खासकर निजी क्षेत्र की नौकरियों में भारत जैसे देश में नियोक्ता भी चाहते हैं कि लोग देर तक काम करें और अपनी नौकरी और उपयोगिता बचाए रखने की चाहत और दबाव में कई कर्मचारी खुद भी ज्यादा देर तक काम करते रहते हैं। बहरहाल, हफ्ते में दो दिन के साप्ताहिक अवकाश के बावजूद एक औसत निष्ठावान कर्मचारी साल में तीन सौ पांच घंटे अधिक काम करता है, जिसे दिन के हिसाब के जोड़ें तो यह अड़तीस दिनों के बराबर होता है। जाहिर है, इतने दिनों का अलग से वेतन नहीं मिलता।इस अध्ययन में शामिल दो हजार लोगों में से छह प्रतिशत लोगों की राय यह थी कि उनसे अधिक समय तक काम करने की उम्मीद की जाती है। इनमें से एक तिहाई लोगों ने कहा कि दफ्तर से पहले निकलने में उन्हें अपराधबोध और असहजता महसूस होती है। इतना ही नहीं, काम खत्म होने के बाद घर से भी लोग सोलह मिनट घर से ई-मेल पढ़ने और उन्हें भेजने में लगाते हैं। यह पूरा समय मिला कर रोजाना करीब एक घंटा अठारह मिनट होता है, जो एक हफ्ते में साढ़े छह घंटे हो जाता है। जब लोगों से पूछा गया कि वे काम के घंटे खत्म होने के बाद क्यों काम करते हैं, तो इकतालीस फीसद लोगों ने स्वीकार किया कि उन्हें लगता है अपना काम ठीक से करने का यह एक ही तरीका है।

भारत जैसे देश में इन दिनों ‘अल्कोहलिक’ यानी आदतन शराब पीने वालों की तर्ज पर लोगों के ‘वर्कोहलिक’ यानी काम को नशे की तरह करने वाला होने की उम्मीदें बढ़ गई हैं। अब सरकारें भी इसी प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही हैं। सवा सौ करोड़ की आबादी वाले अपने देश में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 4.9 करोड़ लोग संगठित क्षेत्र में नौकरी कर रहे हैं। उनमें से एक करोड़ छिहत्तर लाख लोग ही सरकारी नौकरियों में हैं। इसके अलावा चौरानबे प्रतिशत लोग असंगठित क्षेत्र से अपनी रोजी-रोटी जुगाड़ने और घिसटते हुए जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर हैं। नए काम का सृजन इसलिए नहीं हो पा रहा है कि पूरी व्यवस्था ही मुनाफाखोरी पर केंद्रित हो गई है। अब आर्थिक गतिविधियों के केंद्र में कल्याणकारी और ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ की अवधारणा पीछे छूट गई है। ऐसे में कर्मचारियों का शोषण बढ़ा है। सरकारी तंत्र और नीतियां इस शोषण को रोकने के बजाय श्रम सुधारों के बहाने और ज्यादा बढ़ाने में ही मददगार साबित हो रही हैं।

शायद यही वजह है कि भारत जैसे देशों में ऐसे अध्ययन को कभी मुद्दा नहीं बनने दिया जाएगा। वैसे भी मौजूदा माहौल में ऐसी सोच रखने वाले को ही बेवकूफ और आर्थिक सुधारों की राह का रोड़ा माना जाएगा। लेकिन यह अध्ययन रिपोर्ट एक तथ्य को जरूर सामने लाने में कामयाब हुई है कि श्रम की चक्की में पिसती दुनिया के लिए जिंदगी के मायने सिर्फ दौड़ते रहने तक सिमट गए हैं। भागते और हांफते रहने के बीच भी अगर इंसान अपनी आठ घंटे की ड्यूटी पूरी करने के बावजूद दफ्तर से निकलने को लेकर असहजता महसूस करता है तो मान लेना चाहिए कि सभ्यता बदल चुकी है। इस रिपोर्ट के बहाने एक बार फिर गांधी याद आते हैं। मनुबेन को लिखे अपने एक पत्र में वे कहते हैं कि मौजूदा शिक्षा पद्धति इंसान को जिंदगी भर सिर्फ भगाती रहती है। यही इस सभ्यता का मूल हो गया है। गांधी इसे बदलना चाहते थे, जिसमें इंसान जरूरी श्रम के बाद जिंदगी का पूरा आअर्थव्यवस्था की सूरत
यूपीए सरकार के अंतिम चरण में अर्थव्यवस्था में ठहराव आने और नीतिगत पक्षाघात यानी ‘पालिसी पैरालिसिस’ की शिकायत आम थी।

भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में अर्थव्यवस्था को इस स्थिति से उबारने का वादा किया था। लेकिन अब जबकि मोदी सरकार ने अपना आधा कार्यकाल पूरा कर लिया है, अर्थव्यवस्था की क्या हालत है? खुद सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हालत निराशाजनक है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक आइआइपी यानी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में लगातार दूसरे महीने गिरावट दर्ज हुई है। जुलाई में आइआइपी में 2.49 फीसद की गिरावट दर्ज हुई थी, जो कि आइआइपी का आठ महीनों का सबसे निचला स्तर था। अलबत्ता उसके मुकाबले अगस्त की गिरावट काफी कम है, सिर्फ 0.7 फीसद। लेकिन यह कोई राहत की बात नहीं है, क्योंकि अप्रैल से यानी मौजूदा वित्तवर्ष की शुरुआत से अगस्त तक, पांच महीनों के आइआइपी को देखें तो कुल मिलाकर सिकुड़न का सच ही सामने आता है। पिछले साल की इसी अवधि के दौरान 4.1 फीसद की वृद्धि दर्ज हुई थी, जबकि उसके मुकाबले इस साल इन पांच महीनों में आइआइपी 0.3 फीसद सिकुड़ा है। अब मैन्युफैक्चरिंग को लें। इसलिए कि आइआइपी में तीन चौथाई से भी कुछ ज्यादा हिस्सा मैन्युफैक्चरिंग का होता। दूसरे, कृषि और सेवाक्षेत्र की तरह यह भी देश में रोजगार का बड़ा स्रोत है। मैन्युफैक्चरिंग में अगस्त में 0.3 फीसद की गिरावट आई है, जबकि पिछले साल के इसी महीने में उसमें 6.6 फीसद की बढ़ोतरी हुई थी। पूंजीगत सामान को लें, जिससे नए निवेश का अंदाजा लगता है। पूंजीगत सामान के उत्पादन में 22.2 फीसद की गिरावट आई है, जबकि पिछले साल अगस्त में इसकी वृद्धि दर 21.3 फीसद रही थी। जब औद्योगिक उत्पादन और नए निवेश में कमी का रुझान हो, तो रोजगार-सृजन पर बुरा असर पड़ना लाजिमी है।

मोदी सरकार ने हर साल दो करोड़ नए रोजगार का वादा किया था, लेकिन श्रम ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि बेरोजगारी की दर पांच साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है। इससे मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसे धूम-धड़ाके से शुरू किए गए कार्यक्रमों की हकीकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। वित्त व्यवस्था की धुरी कहे जाने वाले बैंकों की हालत देखें। उन पर बुरे कर्ज और गैर-निष्पादित संपत्तियों यानी एनपीए का बोझ और बढ़ गया है। पिछले साल दिसंबर में एनपीए 121 अरब डॉलर पर था, जो कि इस साल जून में 138 अरब डॉलर पर पहुंच गया। साफ है कि रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन द्वारा बैंकों को एनपीए से छुटकारा दिलाने के लिए शुरू की गई मुहिम न सिर्फ जहां की तहां रह गई, बल्कि एनपीए की समस्या ने अब और भी विकट रूप ले लिया है। जहां औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में ह्रास का सिलसिला हो, पूंजीगत सामान की खपत और नए निवेश में कमी का रुझान हो, बेरोजगारी की दर काफी चिंताजनक हो तथा बैंकों पर एनपीए का बोझ और बढ़ता जा रहा हो, वहां अर्थव्यवस्था की शोचनीय दशा बयान करने के लिए और क्या बाकी रह जाता है? बेशक, दुनिया भर के बाजारों में एक हद तक मंदी या ठहराव का आलम है और इसके असर से हम अछूते नहीं रह सकते। पर भारत एक विशाल देश है और इसकी अर्थव्यवस्था की अधिकांश सुस्ती घरेलू मांग के कमजोर होने की वजह से है। घरेलू मांग का अपूर्व और टिकाऊ विस्तार तभी हो सकता है जब उन लोगों की भी आय बढ़े जो क्रय-शक्ति के लिहाज से हाशिये पर रहे हैं।

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First Published on October 12, 2016 4:27 am

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