December 06, 2016

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प्रदूषण पर्व

उलटे इस साल की दिवाली के दौरान प्रदूषण बढ़ने का पिछले तीन साल का रिकार्ड टूट गया।

Author November 1, 2016 05:34 am
दिवाली पर दिल्ली में प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्तर को पार कर गया था।

किसी त्योहार पर खुशी जाहिर करने के तौर-तरीके क्या ऐसे होने चाहिए, जो सारे लोगों और समूचे वातावरण के लिए खतरनाक साबित हों? लेकिन दिवाली ने आज एक ऐसे पर्व की शक्ल अख्तियार कर ली है जो कुछ पलों के आह्लाद के बदले लोगों की सेहत और पर्यावरण पर बेहद गंभीर असर डाल रहा है। हालांकि पिछले कुछ सालों से पटाखों से फैलने वाले वायु और ध्वनि प्रदूषण के प्रति आगाह करने के लिए सरकारें और बहुत सारी संस्थाएं लोगों के बीच जागरूकता फैलाने की कवायद करती रही हैं। लेकिन इसका कोई खास असर नहीं दिखता। उलटे इस साल की दिवाली के दौरान प्रदूषण बढ़ने का पिछले तीन साल का रिकार्ड टूट गया।

आबोहवा में जहरीले तत्त्वों के घुलने के अलावा हालत यह थी कि रविवार की रात और उसके बाद अगले दिन धुंध की चादर में लिपटी सुबह में दो सौ मीटर तक भी साफ-साफ देखना मुमकिन नहीं हो पा रहा था। हवा की गुणवत्ता पर नजर रखने के बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बताया कि इस बार वायु में पार्टिकुलेट मैटर जैसे जहरीले तत्त्वों की मात्रा सुरक्षित मानक के मुकाबले दस गुना ज्यादा तक बढ़ गई। कोई भी यह महसूस कर सकता था कि पटाखों के धमाकों व धुएं के चलते फौरी तौर पर भी किस तरह की परेशानी हो रही थी, और यह भी सहज ही समझा जा सकता है कि लंबे समय में इससे सांस और आंखों से संबंधित किस तरह की तकलीफें हो सकती हैं!

यों प्रदूषण पर निगरानी रखने वाली संस्था ‘सफर’ यानी सिस्टम आॅफ एयर क्वालिटी ऐंड वेदर फोरकास्टिंग ऐंड रिसर्च ने पहले ही चेतावनी जारी कर दी थी कि दिल्ली में इस बार हवा की हालत पहले से ज्यादा खराब हो सकती है। लेकिन ऐसी चेतावनी या सलाह को मानना और उससे निपटने के उपाय करना न संबंधित सरकारी महकमों को प्राथमिक काम लगता है, न साधारण लोग इसका खयाल रखना जरूरी समझते हैं। दिल्ली को पहले ही दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार किया जाता है। एक मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाइकोर्ट ने राजधानी को गैस का चेंबर तक कहा था। पिछले कुछ सालों से अनगिनत वाहनों सहित दूसरे तमाम कारणों से हवा में जहरीले तत्त्वों की बढ़ोतरी दर्ज की गई है और दिवाली के दौरान इसमें बहुत ही चिंताजनक इजाफा हो जाता है।

विडंबना यह है कि स्कूलों में बच्चों को पटाखे न छोड़ने की शपथ दिलाई जाती है, रेडियो-टीवी पर इससे होने वाले प्रदूषण की जानकारी दी जाती है और पटाखे न चलाने की अपील की जाती है। लेकिन लोगों के व्यवहार से लगता है जैसे ये सब बातें उनसे नहीं, किसी और ग्रह के लोगों से ताल्लुक रखती हैं। खासतौर पर संपन्न तबकों के बीच दिवाली के मौके पर पटाखे छोड़ने का उन्माद दिखाई देता है। त्योहारी उत्साह और दिखावे की होड़ पर्यावरण की फिक्र पर हावी हो जाती है। जब आॅड-इवन जैसा कोई सख्त या आकस्मिक प्रयोग होता है, तो लोग परेशानियों का रोना रोते नहीं थकते। पर पटाखों के मामले में अगर वे थोड़ा संयम नहीं बरत सकते, तो कैसे संभव होगा कि दिल्ली में हवा सांस लेने लायक रहे?

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First Published on November 1, 2016 5:34 am

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