December 08, 2016

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कर्ज का मर्ज

एसबीआई के सौ बड़े कर्ज न चुकाने वाले कर्जदारों पर बकाया कुल राशि का करीब अस्सी फीसद है।

Author नई दिल्ली | November 17, 2016 01:55 am
हजारों करोड़ रुपए के कर्ज में दबे माल्‍या इस वक्‍त लंदन में हैं। (PTI)

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक स्टेट बैंक आॅफ इंडिया के भगोड़ा घोषित कारोबारी विजय माल्या सहित तिरसठ कर्जदारों के करीब सात हजार करोड़ रुपए से अधिक के कर्ज को डूबा हुआ पैसा मान लेने से सरकार की बैंकों की सेहत और अर्थव्यवस्था सुधारने की कोशिशों को बड़ा आघात पहुंचा है। यह राशि एसबीआई के सौ बड़े कर्ज न चुकाने वाले कर्जदारों पर बकाया कुल राशि का करीब अस्सी फीसद है। इसके पहले जून के अंत तक एसबीआई करीब अड़तालीस हजार करोड़ रुपए का न वसूला जा सका कर्ज यानी बैड लोन माफ कर चुका है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बैंक की माली हालत क्या हो गई होगी। पिछले कुछ समय से बड़े कर्जदारों पर बकाया राशि न वसूले जा सकने के चलते बैंकों की बिगड़ती आर्थिक और कारोबारी स्थिति को लेकर चिंता जताई जा रही है। ऐसे लोगों पर कुछ सख्ती की उम्मीद की जा रही थी, मगर एसबीआई के नए फैसले से वह उम्मीद धुंधली हुई है। विजय माल्या पर विभिन्न बैंकों का करीब नौ हजार करोड़ रुपए कर्ज बकाया था।

धन शोधन से जुड़े मामलों पर सुनवाई करने वाली विशेष अदालत के आदेश पर प्रवर्तन निदेशालय ने माल्या की महज सोलह सौ बीस करोड़ रुपए की संपत्तियों को कुर्क किया। अब बाकी बैंकों के पास भी माल्या के कर्जों का खाता बंद करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। स्टेट बैंक आॅफ इंडिया का ताजा फैसला ऐसे समय में आया है, जब सरकार ने काले धन और कर चोरी पर अंकुश लगाने का अभियान चला रखा है। अभी तक लोग यही समझ रहे थे कि सरकार के इस कदम से बड़े कारोबारियों के पास जमा काले धन को बाहर लाने में मदद मिलेगी। मगर माल्या के कर्जों को बट्टेखाते में डाले जाने के बाद निस्संदेह उनका विश्वास डिगेगा। इस धारणा को बल मिलेगा कि सरकार बड़े कारोबारियों के प्रति उदार रवैया रखती है। हालांकि माल्या ने प्रस्ताव रखा था कि वे करीब छह हजार करोड़ रुपए चुकाने को तैयार हैं, जो कि वास्तव में उन पर कर्ज बनता है। मगर बैंकों ने उसे मानने से इनकार कर दिया। अब वे पुराने सवाल फिर से सिर उठाएंगे कि जब बैंकों को पता था कि माल्या कर्ज नहीं चुका रहे, उसके बावजूद क्यों उन्हें भारी कर्ज दिए गए।

यह भी छिपी बात नहीं है कि सरकारें उद्योगपतियों को घाटे से उबारने के लिए उन्हें कर्जमाफी और नया कर्ज यानी बेलआउट देती रही हैं। माल्या को भी इसी तरह लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई। जबकि लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है कि सार्वजनिक बैंकों की भारी रकम न चुकाए जाने वाले कर्ज यानी बैड लोन के रूप में रुकी होने के कारण उनके कारोबार पर बुरा असर पड़ रहा है। फिर भी इसे दुरुस्त करने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत नहीं समझी गई। आम वेतनभोगी और छोटे-मंझोले कारोबारी ईमानदारी से कर भुगतान करते हैं, उन पर सरकार लगातार शिकंजा कसती देखी जाती है, पर सार्वजनिक बैंकों का अरबों का कर्ज दबाए बैठे लोगों के खिलाफ उसका रवैया नरम ही क्यों बना रहता है। ऐसे दोहरे रवैए से न तो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की सेहत सुधारी जा सकती है और न अर्थव्यवस्था को गति देने का सपना पूरा हो सकता है। इस घटना से सरकार को बैड लोन के मामले में नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।

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First Published on November 17, 2016 1:55 am

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