December 06, 2016

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संपादकीय: मराकश का मुकाम

पेरिस समझौता की शर्त यह थी कि इक्कीसवीं सदी बीतने तक वैश्विक तापमान को दो डिग्री सेल्शियस से ऊपर नहीं जाने देना है।

Author November 22, 2016 05:09 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

उत्तरी अफ्रीका के देश मोरक्को की राजधानी मराकश में संपन्न हुए जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में शामिल देशों ने कम से कम सिद्धांत रूप में इस पर सहमति जताई है कि 2015 के पेरिस समझौते को लागू करने के लिए 2018 तक कायदे-कानून बना लिये जाएंगे। हालांकि इस एकसूत्री नतीजे तक पहुंचने में कई तरह के पेचोखम भी शामिल रहे हैं। पेरिस समझौता चार नवंबर को लागू हो गया है। इसकी मूल शर्त यह थी कि इक्कीसवीं सदी बीतने तक वैश्विक तापमान को दो डिग्री सेल्शियस से ऊपर नहीं जाने देना है। बल्कि कोशिश यह रहेगी कि 1.5 डिग्री सेल्शियस पर ही बढ़ते तापमान को काबू कर लिया जाए। समझौते में यह भी तय हुआ था कि हरित जलवायु कोष (ग्रीन क्लाइमेट फंड) बनेगा जिसमें से सौ अरब डालर की मदद हर साल गरीब और विकासशील देशों को दी जाएगी, ताकि वे अपने यहां कार्बन स्रोतों पर रोक लगाने की खातिर नई तकनीक विकसित कर सकें। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा जैसे माध्यमों से बिजली उत्पादन भी इस समझौते की एक प्रतिज्ञा थी।

अब जबकि मराकश सम्मेलन में दो सौ देशों ने ग्लोबल वार्मिंग से निपटने की प्रतिबद्धता जताई है तो पहली नजर में यह बड़ी खुशफहमी नजर आती है। सम्मेलन में प्रस्ताव पारित करके 2018 तक पेरिस जलवायु करार को लागू करने को हरी झंडी दे दी गई है। मगर इस नेक इरादे में पलीता लगाने वाले कई सारे मंजर भी सामने आए हैं। कुछ निहित स्वार्थों के चलते कृषि, वृत्त अनुकूलन जैसे मुद््दों पर चर्चा ही नहीं हुई। राजनीतिक आधार पर बंटे देशों की खींचतान कई बार साफ दिखाई दे जाती है। अमेरिका और चीन शुरू से अपनी चलाने की कोशिश करते देखे गए हैं। जिस हरित जलवायु कोष बनाने की बात हुई थी, उसमें अमेरिका को तीन सौ करोड़ डालर देने थे, लेकिन उसने अभी तक केवल पचास करोड़ डालर दिए हैं। मगर अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चुनाव प्रचार के दौरान इस संधि से अपने देश को अलग करने का इरादा जता चुके हैं। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र में वीटो से लैस देशों में अतिराष्ट्रवादी ताकतों के उभार की वजह से भी आम सहमति को पलीता लग सकता है। सम्मेलन में भारत ने दोहा समझौते को लागू करने और विकसित देशों द्वारा कार्बन उत्सर्जन कम करने पर जोर दिया। बढ़ते तापमान की वजह से बाढ़, चक्रवाती तूफान और सूखे जैसे हालात पैदा हो रहे हैं। इस सम्मेलन में विश्व मौसम संगठन ने जो रिपोर्ट प्रस्तुत की है, उसके मुताबिक आने वाले साल के बारे में नब्बे फीसद आशंका इस बात की बढ़ गई है कि गरमी के लिहाज से पिछला सारा रिकार्ड टूट जाएगा।

हालांकि मराकश सम्मेलन में देशों की भागीदारी उत्साह बढ़ाने वाली रही, और यह उम्मीद की जानी चाहिए कि विकसित देश अपनी घरेलू राजनीति या क्षुद्र भू-राजनीतिक इरादों को वैश्विक पर्यावरण की रक्षा में आड़े नहीं आने देंगे। जलवायु न किसी की इजारेदारी की चीज है और न ही निजी उपभोग की। कोई भी अव्यवस्था धरती के एक सिरे से दूसरे सिरे को डगमगा सकती है। कामना ही की जा सकती है कि पेरिस समझौता सौजन्यता और सख्यभाव से लागू हो जाएगा, जिसकी तरफ दुनिया पलक पसारे देख रही है।

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First Published on November 22, 2016 4:57 am

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