December 10, 2016

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संपादकीय: सफाई की फिक्र

आप सरकार के वकील ने बताया कि दिल्ली में कुल छह लैंडफिल क्षेत्र हैं जिनमें से तीन में कूड़े का ढेर पैंतालीस मीटर ऊंचा हो चुका है।

Author नई दिल्ली | October 24, 2016 03:40 am
देखिए किस तरह तमन्ना भाटिया कर रही हैं सफाई (फोटो: वरिंदर चावला)

सरकारों तथा नगर निगमों के रोजाना के जो दायित्व हैं, जब वे भी पूरे नहीं किए जाते तो नागरिकों को हार मान कर अदालत की शरण लेनी पड़ती है। फलस्वरूप किसी सरकार को कभी कानून-व्यवस्था को लेकर अदालत की खरी-खोटी सुननी पड़ती है तो किसी सरकार को साफ-सफाई को लेकर। ताजा मामला दिल्ली का है। बीते शुक्रवार को सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली सरकार को फटकार लगाई। अदालत डेंगू और चिकनगुनिया जैसी मच्छरजनित बीमारियों की रोकथाम के मामले में सुनवाई कर रही थी। दिल्ली में कूड़े के पहाड़ पर चिंता जताते हुए अदालत ने इसे बहुत ही खतरनाक स्थिति करार दिया। लेकिन सवाल है कि कूड़े के निस्तारण का जिम्मा जिन पर है उन्हें इसकी कितनी फिक्र है? सच तो यह है कि इस मामले में दिल्ली सरकार और नगर निगमों का रवैया लापरवाही भरा रहा है। दिल्ली सरकार को अदालत की फटकार लग चुकी है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि नगर निगमों को भी ऐसा ही पाठ पढ़ने को मिलेगा। सुनवाई के दौरान आप सरकार के वकील ने बताया कि दिल्ली में कुल छह लैंडफिल क्षेत्र हैं जिनमें से तीन में कूड़े का ढेर पैंतालीस मीटर ऊंचा हो चुका है। यह कुतुबमीनार की आधी ऊंचाई से ज्यादा है। इस तथ्य से अदालत का चिंतित होना स्वाभाविक था। उसने नाराजगी जताते हुए दिल्ली सरकार से पूछा कि कूड़े का निस्तारण कैसे होगा? आपके पास क्या योजना है? इस सवाल पर दिल्ली सरकार ने कहा कि कूड़ा निस्तारण की जिम्मेदारी निगमों की है। मगर अदालत ने दिल्ली सरकार को नहीं बख्शा और कहा कि आपके पास इतने विधायक हैं, उन्हें इस मामले में जन-जागरूकता फैलाने में क्यों नहीं लगाते? विधायक साफ-सफाई के लिए लोगों को जागरूक करें, इससे अच्छी बात और क्या होगी! पर यह सवाल अपनी जगह बना रहता है कि आखिर दिल्ली के तीनों नगर निगम क्या कर रहे हैं?

सिर्फ उत्तरी नगर निगम क्षेत्र में रोजाना बत्तीस सौ मीट्रिक टन कूड़ा निकलता है। इसके बाद दक्षिणी दिल्ली का नंबर है, जहां यह आंकड़ा अट्ठाईस सौ मीट्रिक टन का है। कई लैंडफिल क्षेत्रों की क्षमता काफी पहले चुक गई है। यही कारण है कि ओखला लैंडफिल क्षेत्र में कूड़े का अंबार अड़तालीस मीटर ऊंचा हो चुका है, तो गाजीपुर लैंडफिल क्षेत्र में पैंतालीस मीटर और भलस्वा में चालीस मीटर। कचरा डालने के लिए नई जगह न मिल पाने से भलस्वा लैंडफिल क्षेत्र को खोदने की तैयारी चल रही है। जाहिर है, एक बड़ी समस्या जमीन संबंधी है। दिल्ली को कचरे के ठीक निस्तारण के लिए करीब डेढ़ हजार एकड़ जमीन चाहिए। अदालत ने आठ नवंबर तक प्रगति-रिपोर्ट मांगी है और अगली सुनवाई ग्यारह नवंबर को होगी। हो सकता है दिल्ली सरकार के बाद तीनों नगर निगम

जवाबदेही के कठघरे में खड़े नजर आएं। दिल्ली में अधिकार और कर्तव्य का हिसाब थोड़ा उलझा हुआ है। नगर निगमों पर भाजपा काबिज है। सरकार आम आदमी पार्टी की है। लेकिन प्रशासनिक मुखिया मुख्यमंत्री नहीं, उपराज्यपाल हैं जो केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश से चलते हैं। ऐसे में जवाबदेही की गेंद दूसरे के पाले में डालने का खेल चलता रहता है। इस पर जितनी जल्दी विराम लगे उतना ही अच्छा होगा। कूड़े का निस्तारण नगर नियोजन का एक अहम मसला है और समन्वित प्रयासों से ही इसे सुलझाया जा सकता है।

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First Published on October 24, 2016 3:40 am

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