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घेरे में जांच

इसमें सीधा अपहरण की कोशिश करने का अभियोग बनता है, जबकि पीछा करने और छेड़खानी करने जैसे हल्के-फुल्के आरोप लगा कर दोनों अभियुक्तों को जमानत दे दी गई।
Author August 9, 2017 05:05 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (Source: Express Archives)

हरियाणा भाजपा अध्यक्ष के बेटे द्वारा आइएएस अफसर की बेटी का पीछा करने के मामले में चंडीगढ़ पुलिस की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। सीसीटीवी सबूतों को लेकर पुलिस के दावे संदिग्ध हैं। इस मामले में पुलिस के रवैए का अंदाजा इसी से हो जाता है कि सोमवार को पत्रकारों के सवालों का जवाब न दे पाने पर चंडीगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आनन-फानन में अपनी ही बुलाई प्रेस कॉन्फ्रेंस छोड़ कर चले गए। हरियाणा में तैनात एक आइएएस अफसर की बेटी पिछले शुक्रवार की आधी रात को जब कार से अपने घर लौट रही थी तो भाजपा के प्रांतीय अध्यक्ष सुभाष बराला के बेटे विकास बराला ने अपने एक साथी के साथ नशे में अपनी एसयूवी से पांच-छह किलोमीटर तक उसका पीछा किया। गाड़ी के सामने अपनी गाड़ी लगाई और लड़की की कार का दरवाजा खोलने की कोशिश की। पुलिस ने इस मामले की रिपोर्ट तो दर्ज कर ली, लेकिन पीड़िता का आरोप है कि अभियोग की धाराएं कमजोर कर दी गई हैं। इसमें सीधा अपहरण की कोशिश करने का अभियोग बनता है, जबकि पीछा करने और छेड़खानी करने जैसे हल्के-फुल्के आरोप लगा कर दोनों अभियुक्तों को जमानत दे दी गई।

इसलिए पुलिस के तौर-तरीके पर यह शक उठना स्वाभाविक है कि कहीं वह राजनीतिक दबाव में तो काम नहीं कर रही है! पुलिस की यह बात भी शायद ही किसी के गले उतरे कि सात सीसीटीवी में से पांच बंद थे। यह कैसे हो सकता है कि चंडीगढ़ जैसे उच्चसुविधा-प्राप्त शहर में अधिकतर सीसीटीवी काम न रह रहे हों और उनकी मरम्मत भी न की जा रही हो! कैमरे बंद थे तो कब से बंद थे? क्यों बंद थे? पीड़िता का दावा है कि उसके पिता ने घटना के तत्काल बाद गृहसचिव को फोन करके सीसीटीवी फुटेज से छेड़छाड़ होने की आशंका जताई थी। इसके बावजूद सबसे अहम सबूतों में से एक सीसीटीवी फुटेजों को सहेजने की कोशिश नहीं की गई। दिल्ली के बहुचर्चित जेसिकालाल हत्याकांड में भी सबूत मिटाए गए थे, क्योंकि उसमें भी आरोपी रसूख वाले थे। लेकिन अदालत की सक्रियता के कारण अभियुक्तों को सजा मिली।

पुलिस को मामले को तार्किक परिणति तक ले जाने लायक सबूत जुटाने चाहिए। पुलिस का जो तौर-तरीका सामने आ रहा है उससे यही लगता है कि पीड़िता अगर किसी बड़े सक्षम अधिकारी की बेटी न होकर, किसी सामान्य परिवार की होती तो शायद इतनी भी कार्रवाई न हुई होती, जितनी हुई है। मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने जरूर कहा कि कानून अपना काम करेगा, लेकिन उनकी पार्टी के एक उपाध्यक्ष ने पीड़िता को ही नसीहत दे डाली कि उसे रात को नहीं निकलना चाहिए था। भाजपा की एक महिला नेता समेत कई लोगों ने पीड़िता की एक पुरानी फोटो सोशल मीडिया पर साझा कर यह सिद्ध करने की कोशिश की कि वह तो अभियुक्त बराला की पुरानी परिचित है। हालांकि इसका खुलासा भी जल्द हो गया, जब पीड़िता ने खुद मीडिया के सामने आकर कहा कि जो तस्वीर सोशल मीडिया में दिखाई जा रही है उसमें उसके साथ मौजूद लड़का उसका बहुत अच्छा दोस्त है। बहरहाल, पुलिस जिस तरह से अपनी जांच आगे बढ़ा रही है, उससे लगता है कि वह दुविधाग्रस्त भी है और दबाव में भी। एक तरफ इस मामले पर मीडिया की पल-पल नजर है, और दूसरी तरफ आरोपी की राजनीतिक पहुंच। इससे पुलिस की कठिनाई समझी जा सकती है। इसका स्थायी समाधान यही है कि पुलिस सुधार के लिए सोली सोराबजी समिति की सिफारिशें लागू की जाएं, जिनमें पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने के उपाय सुझाए गए थे।

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