May 24, 2017

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संपादकीय: भीड़ में भगदड़

बहुजन समाज पाटी की रैली में भगदड़ से लोगों के हताहत और लापता होने की घटना से एक बार फिर रैलियों के प्रबंधन पर सवाल उठे हैं।

Author October 10, 2016 05:16 am
BSP मायावती

बहुजन समाज पाटी की रैली में भगदड़ से लोगों के हताहत और लापता होने की घटना से एक बार फिर रैलियों के प्रबंधन पर सवाल उठे हैं। लखनऊ में कांशीराम की पुण्यतिथि पर आयोजित रैली में लाखों लोग इकट्ठा थे। रैली खत्म होने के बाद बसपा नेता मायावती से मिलने के लिए लगी होड़ में भगदड़ मची और उसमें कुचल कर दो लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए। कई लोग लापता हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब किसी राजनीतिक रैली के दौरान भगदड़ मचने या फिर मौसम की मार से लोगों के दम तोड़ देने की घटना सामने आई है।

लखनऊ में ही कई साल पहले भाजपा के एक आयोजन में साड़ी बांटते वक्त भगदड़ मची और कई महिलाएं हताहत हो गईं। इसके अलावा देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं जब किसी आयोजन में सरकार के किसी बड़े पदाधिकारी के स्वागत के लिए तेज धूप में बच्चों को घंटों खड़ा रखा गया और उनमें से कई बेहोश हो गए। विचित्र है कि इन घटनाओं से कोई भी राजनीतिक दल सबक लेने की कोशिश नहीं करता। भगदड़ या फिर दूसरे तरह की किसी अप्रिय घटना से बचने के एहतियाती उपायों पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाता। सिर्फ स्थानीय प्रशासन पर इसकी जिम्मेदारी डाल दी जाती है।

अब यह चलन आम हो गया है कि जब किसी पार्टी के वरिष्ठ नेता की रैली होती है तो अधिक से अधिक भीड़ जुटाने के मकसद से पार्टी कार्यकर्ता देश के विभिन्न हिस्सों से लोगों को बसों-ट्रकों में भर कर लाते हैं। ऐसे भी प्रमाण मौजूद हैं कि भाड़े पर भीड़ जुटाने की कोशिश की जाती है। कोई राजनीतिक दल अपने समर्थक जुटाए, इससे किसी को एतराज नहीं हो सकता, पर रैलियों, सम्मेलनों में जुटने वाली भीड़ के मुताबिक सुरक्षा इंतजाम भी किए जाने चाहिए।

स्थानीय प्रशासन के भरोसे भीड़ का प्रबंधन नहीं छोड़ा जा सकता। जब पार्टी के कार्यकर्ता भीड़ जुटाने के लिए महीनों पहले सक्रिय हो सकते हैं, तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने में उन्हें क्यों पीछे रहना चाहिए। मायावती की रैली में भीड़ इस कदर बेकाबू कैसे हो गई कि भगदड़ मच गई। अगर बांस-बल्लियों से घेर कर लोगों के आने-जाने का उचित प्रबंध और उन्हें नियंत्रित करने की मुस्तैद व्यवस्था होती, तो शायद इस तरह भगदड़ न मचती। राजनीतिक रैलियों में जुटाए जाने वाले लोग पार्टियों के लिए अपनी ताकत प्रदर्शित करने का जरिया बनते गए हैं। इसलिए रैलियां समाप्त होने के बाद नेता और कार्यकर्ता प्राय: उन्हें अपने हाल पर छोड़ देते हैं। मायावती की रैली में भी यही हुआ। रैलियों के दौरान दुर्घटनाओं के लिए राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी तय हो तो शायद ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है।

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First Published on October 10, 2016 5:16 am

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