December 10, 2016

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स्याह सफेद

इस विधेयक या कानून के जरिए सरकार कैसा संदेश देना चाहती है? विधेयक ने काला धन रखने वालों को पचास फीसद टैक्स चुका कर उसे सफेद बनाने का मौका दिया है।

Author November 30, 2016 01:59 am
नई दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर पकड़े गए नोट। (तस्वीर- एक्सप्रेस फोटो)

सरकार ने काले धन से निपटने के नाम पर मंगलवार को आय कर कानून में संशोधन का विधेयक पेश किया, और उसी दिन यह विपक्ष के शोरशराबे के बीच पास भी हो गया। हालांकि यह कानून में संशोधन का विधेयक है, पर सरकार ने इसे धन विधेयक के रूप में पेश किया, जिसके लिए राज्यसभा की मंजूरी अनिवार्य नहीं है, जहां सरकार अल्पमत में है। इस तरह लोकसभा से पारित होते ही विधेयक के कानून की शक्ल अख्तियार करने का रास्ता साफ हो गया है। पर सवाल है कि इस विधेयक या कानून के जरिए सरकार कैसा संदेश देना चाहती है? विधेयक ने काला धन रखने वालों को पचास फीसद टैक्स चुका कर उसे सफेद बनाने का मौका दिया है। यह उन लोगों को कैसा लगेगा जो ईमानदारी से सारे टैक्स चुकाते रहे हैं? विधेयक में प्रावधान है कि खुद काले धन का खुलासा करने पर पचास फीसद रकम टैक्स में चली जाएगी, पच्चीस फीसद तुरंत मिलेगी और पच्चीस फीसद चार साल बाद। जो पच्चीस फीसद रकम चार साल तक सरकार के पास जमा रहेगी, उससे गरीबों के कल्याण की योजना चलाई जाएगी। लेकिन इस खुलासे के जरिए कितनी रकम आएगी, इसके बारे में फिलहाल कुछ भी अनुमान लगा पाना कठिन है। इस तरह, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना की जो तजवीज निकाली गई है उसका वित्तीय आधार अभी अनिश्चित है।

फिर, पचास फीसद रकम जो टैक्स के रूप में प्राप्त होगी, उसका उपयोग किन मदों में होगा? संशोधित आय कर कानून में यह भी प्रावधान है कि अपने काले धन का खुलासा करने वालों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जाएंगे, उनसे आय का स्रोत भी नहीं पूछा जाएगा। क्यों? जबकि सरकार यह दोहराती रही है कि काला धन भ्रष्टाचार के अलावा हथियारों की तस्करी और आतंकवाद समेत संगठित अपराधों का कारण और स्रोत दोनों है। कैसे पता चलेगा कि अवैध कमाई टैक्स-चोरी के अलावा और किन-किन कुकर्मों से की गई। किसी ने रिश्वत से पैसा जमा किया होगा। अब रिश्वत की आधी रकम जमा करा कर वह बच जा सकता है। काले धन का आधा हिस्सा सरकारी खजाने में देकर बाकी हिस्से को सफेद करने का मौका एक ऐसी सरकार ने दिया है जो काले धन के खिलाफ बहुत सख्त रुख अपनाने का दम भरती है। यह सख्ती है, या नरमी?

इस तरह की मेहरबानी के पीछे यह दलील दी जाती है कि इससे घबराहट और अफरातफरी का माहौल खत्म होगा, साथ ही सरकार के खजाने में काफी पैसा आ जाएगा। सरकार का मकसद सिर्फ राजस्व बढ़ाना है, या भ्रष्टाचार और बेईमानी को खत्म करना? फिर, जब सरकार ने पांच सौ और हजार के नोटों को अमान्य कर दिया, तो रिजर्व बैंक की देनदारी केवल एक निश्चित अवधि में जमा कराए गए उन नोटों की रह गई जो सफेद धन हैं। ऐसे में पचास फीसद के बदले पचास फीसद देने की पेशकश क्यों? फिर, सरकार ने इस मामले के आपराधिक पहलू को क्यों नजरअंदाज कर दिया? क्या प्रस्तावित कानून की कोई संगति अन्य कानूनों से बिठाई जा सकती है? विमुद्रीकरण को बहुत-से लोगों ने सरकार का साहसिक कदम करार दिया। क्या काले धन के पचास फीसद को सफेद करने का मौका देना भी साहसिक कदम है? सच तो यह है कि आय कर कानून में ताजा संशोधन से विमुद्रीकरण की कथित क्रांतिकारिता खोखली जान पड़ने लगी है।

 

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First Published on November 30, 2016 1:59 am

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