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संपादकीय: नाहक एतराज

भारत में अमेरिका के राजदूत रिचर्ड वर्मा के अरुणाचल प्रदेश जाने पर चीन के आपत्ति करने का कोई औचित्य नहीं है।
Author October 26, 2016 04:58 am
अरुणाचल प्रदेश के तवांग में अमरिकी राजनयिक रिचर्ड वर्मा के साथ असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल और अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू (दाएं)। (PTI Photo/21 Oct, 2016)

भारत में अमेरिका के राजदूत रिचर्ड वर्मा के अरुणाचल प्रदेश जाने पर चीन के आपत्ति करने का कोई औचित्य नहीं है। दरअसल, यह एतराज चीन ने इसलिए किया है ताकि वह दुनिया को बताता रहे कि अरुणाचल प्रदेश विवादित क्षेत्र है। चीन की इस प्रतिक्रिया पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने उचित ही, दो टूक जवाब दिया है। जवाब में मंत्रालय ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है और वहां दौरे के लिए अमेरिकी राजदूत को भारत सरकार ने अनुमति दी थी। गौरतलब है कि रिचर्ड वर्मा अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के निमंत्रण पर बाईस अक्तूबर को तवांग गए थे और वहां उन्होंने एक समारोह में हिस्सा लिया था। फिर वर्मा ने अपने इस दौरे की तस्वीरें ट्विटर पर साझा की थीं। ये तस्वीरें सार्वजनिक होते ही चीन बिफर पड़ा।

उसने अमेरिकी राजदूत के अरुणाचल जाने को भारत के साथ सीमा विवाद में अमेरिकी दखलंदाजी करार देते हुए कहा है कि इसके बुरे नतीजे हो सकते हैं, इससे मुश्किल से सीमा पर कायम हुई स्थिरता और शांति भंग हो सकती है। लेकिन अमेरिकी राजदूत ही क्यों, चीन को तो भारत के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और अन्य अतिविशिष्ट व्यक्तियों का भी अरुणाचल का दौरा करना खटकता रहा है। मसलन, पिछले साल फरवरी में उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अरुणाचल दौरे पर नाराजगी जताई थी। लेकिन चीन की ताजा प्रतिक्रिया, जिसमें उसने सीमा पर शांति भंग की धमकी दी है, पहले से कहीं ज्यादा तीखी है और इसके पीछे सीमा विवाद की पृष्ठभूमि के अलावा पिछले दिनों दोनों देशों के रिश्तों में आई तल्खी भी एक वजह हो सकती है। दोनों देशों की सीमा से सटे नब्बे हजार वर्ग किलोमीटर के इलाके पर चीन अपना दावा जताता है, जिसका अधिकांश हिस्सा अरुणाचल प्रदेश का है। दूसरी ओर, भारत का कहना है कि विवाद अड़तीस हजार वर्ग किलोमीटर के अक्साइ चिन को लेकर है, जिस पर चीन ने 1962 में कब्जा कर लिया था।

सीमा विवाद को सुलझाने के लिए दोनों देशों के बीच उन्नीस दौर की वार्ता हो चुकी है, पर नतीजा सिफर रहा है। हल निकलने की अभी कोई उम्मीद भी नहीं दिखती। सीमा विवाद संबंधी बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए एक सैद्धांतिक ढांचे पर सहमति बनी थी और कुछ मानक तय हुए थे। इसमें यह तय हुआ था कि सीमा पर शांति बनाए रखी जाएगी और गलतफहमी या किसी शिकायत की सूरत में दूसरे पक्ष से संपर्क स्थापित कर मामले को सुलटा लिया जाएगा। लेकिन चीनी सैनिकों का कई बार का अतिक्रमण बताता है कि चीन ने इस सैद्धांतिक सहमति को अपेक्षित गंभीरता से नहीं लिया। ऐसे में सीमा विवाद पर होने वाली बैठकें एक औपचारिक कवायद होकर रह गई हैं। क्या पता, कभी चीन में ऐसा नेतृत्व आए जो विस्तारवादी रुख से अलग हट कर सोचे, तो समाधान निकलना मुश्किल नहीं होगा। मगर सीमा पर शांति तो बनी ही रहनी चाहिए। सैद्धांतिक सहमति का एक अहम बिंदु यह भी था कि सीमा विवाद को सुलझाने में स्थानीय आबादी की आकांक्षा को ध्यान में रखा जाएगा। इस कोण से भी भारत का दावा अकाट्य ठहरता है। लेकिन अरुणाचल को लेकर भले चीन यह जरूरी समझता हो कि भारत की दावेदारी पर सवाल उठाते रहा जाए, मगर सीमा पर शांति भंग की चेतावनी देना एक उकसाने वाला जवाब है और उसे ऐसी प्रतिक्रिया से बाज आना चाहिए।

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