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हौसला और हकीकत

नोटबंदी के बाद आम लोगों को पेश आ रही परेशानियों को देखते हुए प्रधानमंत्री का भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा बहुत से लोगों के गले नहीं उतर रहा।
Author December 26, 2016 02:33 am
एक रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

विपक्ष के तमाम विरोधों और आरोपों के बावजूद मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने एक बार फिर दोहराया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी सरकार अपने कदम वापस नहीं लेगी। उन्होंने नोटबंदी के बाद बड़े पैमाने पर पकड़े गए काले धन का उल्लेख करते हुए कहा कि इस समस्या पर जल्दी ही काबू पा लिया जाएगा। बेनामी संपत्ति कानून का जिक्र करते हुए उन्होंने विश्वास दिलाया कि अब इस दिशा में कड़ाई की जाएगी। हालांकि नोटबंदी के बाद आम लोगों को पेश आ रही परेशानियों को देखते हुए प्रधानमंत्री का भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा बहुत से लोगों के गले नहीं उतर रहा। वे काले धन पर अंकुश लगाने के लिए जगह-जगह डाले जा रहे छापों को नोटबंदी से पैदा हो रही परेशानियों की तरफ से ध्यान हटाने वाला कदम बता रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि नोटबंदी एक प्रकार से बड़े औद्योगिक घरानों और कारोबारियों को लाभ पहुंचाने वाला कदम है। इससे एक अलग तरह का भ्रष्टाचार पनपेगा।

यह सही है कि नोटबंदी से पैदा हुई समस्याओं से पार पाने के लिए प्रधानमंत्री ने पचास दिन का समय मांगा था, पर इस दौरान जितने नियम बदले गए और नगदी का प्रवाह सुनिश्चित करने में जिस तरह सरकार को मुश्किलों का सामना करना पड़ा, उससे सरकार की तैयारियों पर सवाल उठे। लोगों को जरूरत भर की नगदी उपलब्ध कराने के बजाय सरकार ने कैशलेस यानी नगदी रहित लेन-देन को बढ़ावा देने का रास्ता अख्तियार किया। इस दिशा में ग्राहकों और कारोबारियों को प्रोत्साहित करने के लिए इनामी योजनाएं घोषित की गईं। जबकि हकीकत यह है कि भारत जैसे देश में, जहां ज्यादातर रोजमर्रा के काम नगदी लेन-देन के जरिए होते हैं, यह व्यवस्था न तो हर किसी के लिए उपयोगी हो सकती है और न इसकी पहुंच सब तक है। दुनिया के तमाम विकसित देशों में भी नगदी रहित लेन-देन आंशिक रूप से ही हो पाता है, पर सरकार शायद इसके व्यावहारिक पहलुओं पर विचार नहीं करना चाहती।

जहां तक काले धन की पहचान का सवाल है, पिछले कुछ दिनों में जगह-जगह आयकर विभाग के छापों में काफी रकम पकड़ी गई है। प्रधानमंत्री ने कहा भी कि छापों के जरिए काले धन का पता लगाने में उन्हें इसलिए कामयाबी मिली कि आम लोगों ने इसकी सूचनाएं सरकार को दीं। उन्हें विश्वास है कि आम लोगों का इसी तरह सहयोग मिलता रहा तो भ्रष्टाचार से लड़ना मुश्किल नहीं है। मगर अब तक पड़े छापों में कुछ छोटे अधिकारियों, कारोबारियों के अलावा कोई बड़ा आदमी पकड़ में नहीं आया, जिससे सरकार की कार्रवाई को लेकर भरोसा बने। ऐसे छापे पड़ते ही रहते हैं। विपक्ष जो आरोप लगा रहा है कि इससे बड़े उद्योग समूहों को फायदा पहुंचाया जा रहा है, उस पर भी सरकार को अपना पक्ष रखना चाहिए। बैंकों का बहुत सारा पैसा गैर-निष्पादित संपत्ति यानी एनपीए के रूप में पड़ा है, जो बड़े उद्योगपतियों और रसूखदार लोगों के नाम है। उसे वापस लाना एक बड़ी चुनौती है। मगर सरकार उस पर कोई कड़ा रुख नहीं अपना रही। इसलिए प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार से लड़ने के हौसले पर बहुत सारे लोगों को भरोसा नहीं बन पा रहा। अभी तक आम लोग इसलिए नोटबंदी का समर्थन करते आ रहे हैं कि उन्हें उम्मीद है कि बड़े भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसेगी। अगर ऐसा नहीं हो पाया तो उनका भरोसा देर तक शायद ही कायम रह पाएगा।

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