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उत्तर प्रदेश देश की सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य है तो उसकी समस्याएं भी बनिस्बतन बहुत बड़ी हैं। बेरोजगारों की फौज, बदहाल चिकित्सा व्यवस्था, किसान-मजदूरों की मुश्किलों के अलावा और भी कई चुनौतियां हैं जिनसे राज्य सरकार को निपटना है।
Author June 28, 2017 05:19 am
सीएम योगी ने ईद के मौके पर कहा कि खुशी का यह त्यौहार आपसी भाईचारे की भावना को बढ़ाता है और सामाजिक एकता को मजबूत करता है। (File Phote PTI)

उत्तर प्रदेश देश की सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य है तो उसकी समस्याएं भी बनिस्बतन बहुत बड़ी हैं। बेरोजगारों की फौज, बदहाल चिकित्सा व्यवस्था, किसान-मजदूरों की मुश्किलों के अलावा और भी कई चुनौतियां हैं जिनसे राज्य सरकार को निपटना है। साथ ही, दलितों और मुसलमानों, जिनकी आबादी एक तिहाई से ऊपर है, को सुरक्षा और न्याय देना आज सबसे बड़ी जरूरत है। ऐसे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने सौ दिन के कामकाज का जो रिपोर्ट कार्ड जारी किया है उसे अतिरंजित ही कहा जाएगा। पिछली फरवरी में उत्तर प्रदेश समेत जिन पांच राज्यों में चुनाव हुआ था, उनमें से चार राज्यों में भाजपा की सरकारें बनी थीं। लेकिन योगी के अलावा किसी और राज्य की सरकार ने अपनी उपलब्धियां गिनाने की उतावली नहीं दिखाई। आखिर योगी सरकार को ही क्यों अपनी उपलब्धियां गिनाने की इतनी बेचैनी थी, वह भी महज सौ दिन पूरे होने पर!

उत्तर प्रदेश में लोकसभा की अस्सी सीटें हैं, इसलिए स्वाभाविक ही 2019 के आम चुनाव के मद््देनजर उस पर भाजपा की खास नजर है। 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में अपना दल की दो सीटों समेत अस्सी में से तिहत्तर सीटें जीत कर जो जलवा मोदी ने कायम किया था, असल मकसद उसे बरकरार रखना है। योगी जब से राज्य के मुख्यमंत्री बने हैं तभी से राजनीतिक पंडित उन्हें मोदी के उत्तराधिकारी के रूप में देख रहे हैं। यही वजह है कि योगी सरकार अपनी ‘उपलब्धियों’ के बखान में पीछे नहीं रहना चाहती। जिसे उपलब्धि के तौर पर पेश किया जा रहा है, वह है किसानों की कर्जमाफी, भू-माफिया विरोधी कार्यबल का गठन, बिजली आपूर्ति के घंटों में वृद्धि, एंटी-रोमियो का दस्ते का गठन, अवैध बूचड़खाने बंद होना और गड्ढामुक्त सड़कें। किसानों की कर्जमाफी की असलियत यह है कि तीन महीने बाद भी बैंकों के पास ऋणमाफी का आदेश नहीं पहुंचा है। बिजली की आपूर्ति में कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन दावे की तुलना में काफी कम। सत्ताईस फीसद गड्ढे मियाद पूरी होने के बाद भी नहीं भरे गए हैं।

योगी सरकार के जो फैसले सबसे ज्यादा विवाद का विषय बने हैं वे हैं एंटी-रोमियो दस्ते का गठन और सक्रियता और बूचड़खानों को बंद किया जाना। इसे एक समुदाय विशेष के खिलाफ अभियान के तौर पर देखा गया। यह विडंबना है कि सरकार इसे अपनी उपलब्धि बता रही है। युवाओं को लैपटॉप और एक जीबी मुफ्त डाटा देने का वादा हो या आलू, प्याज-लहसुन के न्यूनतम समर्थन मूल्य का मामला, सरकार ने अभी इस दिशा में सोचा तक नहीं है। योगी सरकार सबसे ज्यादा नाकाम रही है कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर। हालांकि वह इसी मामले में ज्यादा डींग हांक रही है। सहारनपुर और मुजफ्फनगर समेत कई जगह हुए सांप्रदायिक और जातीय संघर्ष से सरकार की किरकिरी हुई है। अट्ठाईस साल बाद राज्य और केंद्र में एक ही दल की सरकार है। इसलिए दोनों के बीच सत्ता-समीकरण बेहतर हैं। इस लिहाज से योगी सरकार को कुछ ज्यादा बड़ी उपलब्धि हासिल करनी चाहिए था, खासकर जब खुद प्रधानमंत्री भी इसी राज्य से चुने गए हैं। भाजपा ने अपने लोक कल्याण संकल्प पत्र में जितने बड़े-बड़े दावे किए थे, उनमें से अधिकांश को तो अभी छुआ ही नहीं गया है। सौ दिन का रिपोर्ट कार्ड खुद अपनी पीठ थपथपाने जैसा है।

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