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बुधवार को दिल्ली के जंतर मंतर पर आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान एक किसान की आत्महत्या ने पार्टी को कठघरे में खड़ा कर दिया है। राजस्थान के दौसा से रैली में आए गजेंद्र सिंह ने पेड़ पर फंदा लगा कर खुदकुशी कर ली। हजारों लोगों की मौजूदगी में, जहां मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री भी […]
Author April 24, 2015 13:52 pm

बुधवार को दिल्ली के जंतर मंतर पर आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान एक किसान की आत्महत्या ने पार्टी को कठघरे में खड़ा कर दिया है। राजस्थान के दौसा से रैली में आए गजेंद्र सिंह ने पेड़ पर फंदा लगा कर खुदकुशी कर ली। हजारों लोगों की मौजूदगी में, जहां मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री भी हों और दर्जनों पुलिसकर्मी भी, एक व्यक्ति का इस तरह सरेआम मौत को गले लगा लेना, विचलित कर देने वाली घटना है। क्या गजेंद्र सिंह को बचाया नहीं जा सकता था? खुदकुशी से पहले उसने एक पर्ची गिराई, जिसमें उसने अपनी बरबाद फसल का मुआवजा न मिलने पर खुद को आहत बताया था। जिस पेड़ पर वह बैठा था वह मंच से ज्यादा दूर नहीं था। फंदा लगाते समय भी उस पर कइयों की नजर पड़ी होगी। फिर भी उसे बचाया नहीं जा सका! विडंबना यह है कि गजेंद्र सिंह की मौत के बाद भी रैली चलती रही, आम आदमी पार्टी के संयोजक और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपना भाषण पूरा किया। उनका कहना है कि वे उस व्यक्ति को पेड़ से उतारने की अपील पुलिस से करते रहे, पर पुलिस ने उसे बचाने की कोशिश नहीं की। इसी के साथ उन्होंने यह भी कैफियत दी है कि दिल्ली पुलिस उनकी सरकार के मातहत नहीं है। लेकिन यह सफाई लीपापोती के अलावा कुछ नहीं है।

बेशक पुलिसकर्मियों ने मौके पर अपने कर्तव्य के प्रति अक्षम्य लापरवाही दिखाई। लेकिन वहां मौजूद आप के लोग भी क्यों तमाशा देखते रहे? रैली के बाद आप के नेता गजेंद्र सिंह का हाल जानने अस्पताल पहुंचे, तब तक डॉक्टर उसे मृत घोषित कर चुके थे। राहुल गांधी भी वहां गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर इस हादसे पर दुख जताया और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने घटना की जांच का आदेश दिया। जाहिर है, इस मामले को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है। संवेदना जताने और किसान हितैषी दिखने की होड़ लगी है। लेकिन राजनीतिक दल किसानों की हालत को लेकर इतने ही संवेदनशील हैं, तो किसानों की ऐसी हालत क्यों है? गजेंद्र सिंह की खुदकुशी के साथ जुड़ी खास बात यह है कि वह भीड़ के सामने और शासन और पुलिस के नुमाइंदों की मौजूदगी में हुई। वरना किसानों की आत्महत्या की खबरें लगभग रोजाना आती रहती हैं। फिर, यह त्रासदी लंबे समय से चल रही है। उदारीकरण का दौर शुरू होने से अब तक ढार्ई दशक के दौरान तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। कांग्रेस ने इस सिलसिले को रोकने के लिए अपने दस साल के शासनकाल में क्या किया? और भाजपा क्या कर रही है? गजेंद्र सिंह राजस्थान का रहने वाला था, जहां भाजपा की सरकार है; उसे मुआवजा क्यों नहीं मिला?

हाल में बेमौसम की बारिश से हुई फसलों की बरबादी किसानों की खुदकुशी की ताजा घटनाओं की वजह मानी जा रही है। फौरी तौर पर यह बात सही है, मगर ज्यादा बड़ा कारण यह है कि खेती घाटे का धंधा हो चुकी है। जब पैदावार अच्छी होती है तब भी कई बार वाजिब दाम न मिलने से किसान खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। खेती पुसाने लायक बने इसकी फिक्र न यूपीए सरकार को थी न भाजपा सरकार को है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि वह सुनिश्चित करेगी कि स्वामीनाथन समिति की सिफारिशें लागू हों और किसानों को उनकी उपज की लागत से डेढ़ गुना दाम मिले। मगर सत्ता में आते ही उसने इस आश्वासन को ताक पर रख दिया। गेहूं और धान के समर्थन मूल्य में बेहद मामूली बढ़ोतरी की गई। यही नहीं, केंद्र ने राज्यों को निर्देश दिया कि वे किसानों को अतिरिक्त बोनस न दें। आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह है, पर वास्तव में किसानों की फिक्र किसे है!

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