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दिल्ली की कमान

सोमवार को आया दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला उपराज्यपाल के लिए भी झटका है और केंद्र के लिए भी। कुछ समय से उपराज्यपाल इस तरह से व्यवहार कर रहे थे जैसे उन्हीं को सारे अधिकार हासिल हैं और दिल्ली की सरकार को मिले जनादेश का कोई मूल्य नहीं है। उन्होंने लिखित फरमान जारी कर कहा […]
Author May 27, 2015 10:38 am

सोमवार को आया दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला उपराज्यपाल के लिए भी झटका है और केंद्र के लिए भी। कुछ समय से उपराज्यपाल इस तरह से व्यवहार कर रहे थे जैसे उन्हीं को सारे अधिकार हासिल हैं और दिल्ली की सरकार को मिले जनादेश का कोई मूल्य नहीं है। उन्होंने लिखित फरमान जारी कर कहा था कि क्लर्क से लेकर मुख्य सचिव तक, सारी नियुक्तियों, तैनाती और तबादले का हक उन्हें ही है। उन्होंने दिल्ली सरकार के कई फैसले भी रद्द घोषित कर दिए थे। यह दिल्ली सरकार को कैसे स्वीकार्य हो सकता था?

लिहाजा, तनाव बढ़ा और उसने तीखे विवाद की शक्ल अख्तियार कर ली। टकराव तब चरम पर जा पहुंचा जब मुख्यमंत्री के एतराज के बावजूद उपराज्यपाल ने कार्यवाहक मुख्य सचिव के तौर पर शकुंतला गैमलीन को नियुक्त कर दिया। यह साफ था कि उपराज्यपाल लगातार अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में केंद्र के उचित हस्तक्षेप से ही विवाद सुलझ सकता था। लेकिन केंद्र ने जो कदम उठाया उससे मामला और उलझ गया। उसने नजीब जंग को मर्यादा में रहने की हिदायत देने के बजाय, वे जो कर रहे थे उस पर अपनी मुहर लगा दी।

पिछले हफ्ते केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया कि सारी नियुक्तियां, तैनाती और तबादले उपराज्यपाल के विवेकाधिकार के तहत आते हैं। वे मुख्यमंत्री या दिल्ली सरकार से परामर्श करें या नहीं, यह उनकी मर्जी पर निर्भर है। इसी अधिसूचना में यह बात भी शामिल थी कि दिल्ली का भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो केंद्रीय अधिकारियों के खिलाफ आरोपों का संज्ञान नहीं ले सकता। लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र के इस निर्देश को गलत ठहराया है। इसी के साथ केंद्र की अधिसूचना को भी संदिग्ध करार दिया है। अदालत ने यह भी दो टूक कहा है कि उपराज्यपाल अपने विवेकाधिकार से काम नहीं कर सकते, वे मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य हैं। अदालत का यह फैसला पूरी तरह लोकतांत्रिक तकाजों के अनुरूप है। साथ ही यह ऐसे मामले में न्यायिक परिपाटी से मेल खाता है।

इससे पहले भी, जब-जब अधिकारों के ऐसे विवाद सुनवाई का विषय बने, उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले निर्वाचित सरकारों के पक्ष में आए। नजीब जंग मनमानी कर रहे थे तो केंद्र का कर्तव्य उन्हें उनकी सीमा का अहसास कराना था। मगर केंद्र ने उलटे निहायत बेतुकी अधिसूचना जारी करके एक तरह से जंग की हौसला-आफजाई ही की। इससे यह शक और गहरा हुआ कि जंग दिल्ली सरकार को पंगु बनाने में जुटे हुए थे तो इसके पीछे केंद्र की शह रही होगी। अगर दिल्ली में भाजपा का मुख्यमंत्री होता, क्या तब भी उपराज्यपाल और मोदी सरकार का रवैया यही होता?

दिल्ली की विशेष स्थिति का हवाला देकर मुख्यमंत्री के पर कतरने की कोशिश तभी हुई जब केंद्र और राज्य में अलग-अलग दल की सरकारें रहीं। पिछले दिनों वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा तभी मिल सकता है जब इस बारे में आम सहमति हो। उनसे पूछा जाना चाहिए कि बाधा किस तरफ से है? दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग भाजपा ने ही शुरू की थी और दिल्ली के हर चुनाव में यह उसका एक खास मुद्दा होता था। फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव में पहली बार वह इस मामले में खामोश रही। आम सहमति की बात केवल लीपापोती के लिए नहीं की जानी चाहिए। अगर जेटली आम सहमति की जरूरत जता रहे हैं, तो वे इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की पहल क्यों नहीं करते? लोकसभा में भाजपा को बहुमत हासिल है। अगर वह चाहती है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले, तो इससे अच्छा मौका और क्या होगा!

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