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चौपाल : जुर्म की जड़ें

बुलंदशहर की घटना के बाद मुख्यमंत्रीजी की सक्रियता देख लग रहा था कि शायद अब उत्तर प्रदेश में ऐसे अपराधों में कुछ हद तक गिरावट नजर आएगी मगर अफसोस, ऐसा कुछ भी होता नहीं दिख रहा है।
Author नई दिल्ली | August 17, 2016 06:30 am
यूपी के सीएम अखिलेश यादव।

बुलंदशहर की घटना के बाद मुख्यमंत्रीजी की सक्रियता देख लग रहा था कि शायद अब उत्तर प्रदेश में ऐसे अपराधों में कुछ हद तक गिरावट नजर आएगी मगर अफसोस, ऐसा कुछ भी होता नहीं दिख रहा है। बदमाशों के हौसले जस के तस हैं। न तो पुलिस न प्रशासन अभी तक किसी प्रकार की कोई सक्रियता दिखाने में सफल हुआ है। महिलाओं के प्रति आए दिन बढ़ते अपराधों ने प्रदेश सरकार की महिली विरोधी और अपराध परस्त छवि का बखूबी निर्माण किया है।

अपराधों के प्रति सरकार की उदासीनता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि छह महीने के दौरान उत्तर प्रदेश में दुष्कर्म की 1689 वारदात हुई हैं। इसी अवधि में राष्ट्रीय महिला आयोग को देश भर से महिलाओं के खिलाफ अपराध की कुल 3,868 शिकायतें मिलीं, जिनमें सर्वाधिक 2,079 शिकायतें उत्तर प्रदेश से हैं। ‘बदल रहा है उत्तर प्रदेश संवर रहा उत्तर प्रदेश’ का नारा बुलंद करने वाली सपा सरकार उत्तर प्रदेश को इस तरह से बदल देगी शायद ही किसी ने सोचा होगा।

नेताजी का मंच से अपने कार्यकर्ताओं को सुधर जाने का संदेश देना यह प्रमाणित करता है की सपाई बिगड़े हुए हैं, उनकी सर्विसिंग होनी चाहिए। सपा सरकार के कार्यकाल में अचानक अपराधों का बढ़ जाना इस बात के पुष्ट संकेत देता है कि सरकार अपराधियों का खुला समर्थन करती है। ऐसी छवि सपा के लिए आने वाले चुनाव में तनाव का सबब बन सकती है। इसके सुधार के लिए महज नेताजी का सजग होना काफी नहीं है। सरकार को स्वयं अपराधियों को दंडित कर अपनी छवि सुधारने का प्रयास करना चाहिए।

छोटे-मोटे अपराध करके विधायकजी से ‘सोर्स’ लगा कर मामला रफा-दफा कराने वाले अपराधियों का हौसला इस कदर बढ़ गया है कि वे अब 25-30 रुपए का टोल टैक्स चुकाने के बजाय 100-150 रुपए की गोली चलाना ज्यादा सुलभ समझते हैं। नेताओं का अपराधियों को दिया जाने वाला यही समर्थन यूपी में अपराध की जड़ है। इसके प्रति यदि सरकार सचेत होने का जोखिम उठाने से कतरा रही है तो जनता को ही आगे बढ़कर बदलाव की पटकथा लिखनी होगी। वरना इसी तरह हाइवे पर, सड़कों पर मां-बहन-बेटियों की इज्जत लुटती रहेगी और मुआवजा बंटता रहेगा मगर अपराध नहीं थमेंगे।

आनंद श्रीवास्तव, इलाहाबाद विश्वविद्यालय


विफल संघर्ष
सोलह साल से अफस्पा को लेकर अनशन कर रही ‘लौह महिला’ के नाम से विख्यात इरोम शर्मिला ने नौ अगस्त को अनशन समाप्त कर मणिपुर विधानसभा का चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। उनके विफल संघर्ष का दुख तो है पर इसका हश्र वही होना था जो अन्य एकांगी आंदोलनों, मसलन गंगा बचाओ आंदोलन, नर्मदा बचाओ आंदोलन, सेज विरोधी आंदोलन, चिपको आंदोलन, अण्णा आंदोलन आदि का हुआ।

हमें समझना होगा कि सामाजिक या राजनीतिक बदलाव उत्पादक शक्तियों के स्तर के जनोपयोगी विकास द्वारा ही होता है। इसलिए आम जनों की ‘मुक्ति’ को समर्पित तमाम लोगों को भौतिक मुद्दों पर आधारित राष्ट्रीय लोकतांत्रिक आंदोलन के बारे में सोचना होगा। इसके लिए वर्तमान आर्थिकी की दशा और दिशा पर व्यापक विमर्श करना होगा।

रोहित रमण, पटना विश्वविद्यालय, पटना


यह मिसाल
पिछले दिनों खबर आई कि बराक ओबामा की छोटी बेटी साशा एक रेस्तरां में काम कर रही है। भारत के संदर्भ में यह निश्चित ही ऐतिहासिक घटना है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति की बेटी नौकरी कर रही है, वह भी किसी रेस्तरां में और पूरे नियमों का पालन करते हुए! मैं इसे भारत के संदर्भ में देखूं तो समझ नहीं आता कि कहां से शुरू करूं! हमारे यहां तो कोई एक बार विधायक या पार्षद भी बन जाए तो वह न सिर्फ पांच साल, बल्कि मरते दम तक उस पद को भुनाता रहता है। और सिर्फ वही नहीं, उसका पूरा परिवार ही खुद को विधायक या पार्षद समझने लगता है। परिवार के अतिरिक्त उसके नाते-रिश्तेदार या मित्र भी उसका नाम लेकर अपने काम कराते रहते हैं।

ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करते पकड़े जाने पर शान से किसी रसूखदार को फोन लगाना या तबादला करवाना, और ऐसा कराते हुए लोग बहुत गौवान्वित महसूस करते हैं। कुछ दिन पहले मैं एक कार्यशाला में थी। एक महिला बीच में ही उठ कर जाने लगी तो मैंने आश्चर्य से पूछा कि यह इस तरह से बीच में ही कार्यशाला छोड़कर क्यों जा रही है? इस पर उनमें से एक ने बाहर खड़ी लालबत्ती कार की ओर इशारा करते हुए कहा कि यह फलां की रिश्तेदार है। आगे आप समझ ही गए होंगे।

लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति की बेटी का इस तरह से काम करना वाकई बहुत बड़ी घटना है। हमारे यहां तो शायद ऐसा बहुत ही कम होगा या होगा ही नहीं। लेकिन इस तरह के उदाहरण वाकई में मिसाल हैं जहां पर लोग अपने पिता के बूते नहीं बल्कि अपने दम पर कुछ करना चाहते हैं, अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहते हैं। शायद यही है सच्ची देशभक्ति। हम तो देशभक्ति के नाम पर आडंबर करते हैं, लेकिन अपने व्यवहार में उसे उतारते नहीं हैं।

प्रेरणा मालवीया, भोपाल


किसकी आजादी
कैसी विडंबना है कि हर साल मनाया जाने वाला स्वाधीनता दिवस हमें चौतरफा पराधीनता का अहसास दिला कर कुछ और मायूसी से भर जाता है। आज हम लोग केवल कहने के लिए स्वतंत्र हैं। हमारे लोकतंत्र में ‘लोक’ के लिए कहीं कोई जगह नहीं है, न उसकी कहीं कोई सुनवाई है। हर जगह बस ‘तंत्र’ ही हावी है। इस सबके बीच कोढ़ में खाज यह कि भारत माता कुछ गंभीर बीमारियों से कराह रही है।

भ्रष्टाचार उनमें प्रमुख है। निगरानी तंत्र ही ध्वस्त हो गया है। किसी भी सरकारी कार्यालय में जाइए, बिना रिश्वत दिए कोई काम नहीं होता। हालत यह है कि शिक्षक भी रिश्वत देकर बनने लगे हैं। बेरोजगारी की समस्या दिन-प्रतिदिन विकराल होती जा रही है। एमए, बीए पास युवक चपरासी की नौकरी करने के लिए दौड़ पड़ते हैं। हमारे देश में दो तरह की शिक्षा व्यवस्थाएं लागू हैं। एक, अमीरों के लिए और दूसरी, लाचार और गरीब लोगों के लिए। एक अनपढ़ मंत्री बन जाता है और पीएचडी किए हुए युवक चपरासी बनने के लिए भी तरसते हैं। यह है हमारे देश की वास्तविक स्थिति। यह सूरत कब बदलेगी?

देवेंद्रराज सुथार, जालोर, राजस्थान

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