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वायदों का पहाड़

2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने उत्तर प्रदेश में शाह का हाथ बंटाया था जहां अपना दल की दो सीटों सहित भाजपा की झोली में अस्सी में से तिहत्तर सीटें आर्इं।
Author March 20, 2017 05:26 am
उत्तराखंड सीएम की शपथ लेते हुए त्रिवेंद्र सिंह रावत। (Photo Source: ANI)

भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की तरह उत्तराखंड में भी मुख्यमंत्री पद के लिए कोई नाम घोषित कर चुनाव नहीं लड़ा था। सो, नतीजे भाजपा के पक्ष में आते ही कौन होगा मुख्यमंत्री की अटकलें लगाई जाने लगीं। दावेदार कई थे, पर सेहरा बंधा त्रिवेंद्र सिंह रावत के सिर। शनिवार को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह समेत पार्टी के अनेक बड़े नेताओं की मौजूदगी में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। जो बातें त्रिवेंद्र सिंह रावत के पक्ष में गर्इं वे जाहिर हैं। रावत उन्नीस-बीस साल की उम्र में ही आरएसएस से जुड़ गए थे। पार्टी की पारी शुरू करने से पहले वे लंबे समय तक संघ के प्रचारक रहे थे। भाजपा के अन्य कई बड़े नेताओं की तरह वे भी संघ से पार्टी में आए; 1993 में संघ की ओर से उन्हें भाजपा में संगठन मंत्री का दायित्व सौंपा गया। लिहाजा, वे उत्तराखंड के लिए संघ की पसंद रहे होंगे और यह उनके काम आया होगा। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के भी वे काफी करीब माने जाते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने उत्तर प्रदेश में शाह का हाथ बंटाया था जहां अपना दल की दो सीटों सहित भाजपा की झोली में अस्सी में से तिहत्तर सीटें आर्इं। झारखंड विधानसभा के चुनाव में मिली जीत में भी रावत की अहम भूमिका मानी जाती है। उनके पास दोनों तरह का अनुभव है, सांगठनिक भी और प्रशासनिक भी। रावत भाजपा के टिकट पर डोईवाला सीट से पहली बार विधानसभा चुनाव जीते। 2007 में फिर विजयी हुए और 2012 तक कृषिमंत्री रहे। अब राज्य के नेतृत्व की कमान उनके हाथ में है।

सत्तर सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के सत्तावन विधायक चुन कर आए हैं। जाहिर है, रावत के सामने सरकार के स्थायित्व की कोई समस्या नहीं है, जो कि कई बार छोटे राज्यों में हो जाती है। अलबत्ता उनके सामने दूसरी चुनौतियां अनेक हैं। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से कई घोटाले चर्चा में रहे हैं, कांग्रेस राज में भी और पहले की भाजपा सरकारों के दौरान भी। इस बार के चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी ने राज्य की जनता को भरोसा दिलाया कि भाजपा सत्ता में आई तो पारदर्शी प्रशासन देगी। देखना है, रावत सरकार इस वादे पर कितना खरा उतरती है। राज्य से रोजगार की तलाश में होने वाला पलायन भी भाजपा का एक खास मुद््दा था। पर काफी संख्या में रोजगार के नए अवसर पैदा किए बिना पलायन को नहीं रोका जा सकता। उत्तराखंड में विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी उतना ही अहम तकाजा है, नई सरकार को दोनों के बीच संतुलन साधने की परिपक्वता दिखानी होगी।
जहां ये अपेक्षाएं अपनी जगह हैं, वहीं कुछ सवाल भी उठे हैं। कांग्रेस के पांच बागियों को मंत्री बना कर भाजपा ने क्या संदेश देना चाहा है? त्रिवेंद्र सिंह रावत की संघ की पृष्ठभूमि को देखते हुए यह माना जा रहा है कि राज्य सरकार के कामकाज में दखल देने में संघ तनिक संकोच नहीं करेगा और हो सकता है दखलंदाजी अफसरों पर संघ के कार्यकर्ताओं की निगरानी और मनमानी चलाने की हद तक जा पहुंचे। अगर यह अंदेशा सही निकला तो यह न राज्य की नई सरकार के लिए शुभ होगा न पार्टी के लिए। लोकतांत्रिक कार्य-प्रणाली के लिए तो यह चिंताजनक संकेत है ही।

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