March 24, 2017

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सर्वे की साख

एक बार फिर चुनाव सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। सारे सर्वेक्षण यह दावा करते हैं कि उनके आंकड़े रायशुमारी से निकाले गए हैं, लिहाजा नतीजे ऐसे ही आएंगे।

Author March 13, 2017 05:41 am
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जीत का जश्न मनाते भाजपा कार्यकर्ता (Image Source: IE)

एक बार फिर चुनाव सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। सारे सर्वेक्षण यह दावा करते हैं कि उनके आंकड़े रायशुमारी से निकाले गए हैं, लिहाजा नतीजे ऐसे ही आएंगे। फिर, सर्वेक्षणों और वास्तविक नतीजों में काफी दूरी दिखाई दे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इन सर्वे एजेंसियों की कार्यप्रणाली क्या है। जो नतीजे आए हैं उसका ठीक पूर्वानुमान कोई भी सर्वेक्षण क्यों नहीं दे सका? चुनावी सर्वे किस कदर कच्चे साबित हुए हैं इसका अंदाजा लगाने के लिए उनकी भविष्यवाणियों को याद करें। किसी ने उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस गठबंधन की बढ़त की भविष्यवाणी की थी, तो किसी ने भाजपा के आगे रहने की। लेकिन उत्तर प्रदेश में भाजपा को ऐसा भारी बहुमत मिलेगा और सपा-कांग्रेस तथा बसपा की ऐसी दुर्गति होगी, इसके अनुमानित आंकड़े किसने दिए थे? यों कहा जा सकता है कि मतदाता का मिजाज बदल सकता है और आखिरी दौर में मोदी के धुआंधार प्रचार अभियान ने वैसे बहुत-से लोगों को भाजपा के पक्ष में मोड़ दिया होगा, जो तब तक अनिर्णय में झूल रहे थे। लेकिन याद करें, आखिरी समय तक अधिकतर अनुमान उत्तर प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा के आसार जता रहे थे। सबसे हैरानी की बात यह है कि मतदान से पहले की रायशुमारी तो दूर, मतदान बाद के सर्वे यानी एग्जिट पोल भी खरे नहीं उतरे। ऐसा क्यों हुआ? मतदान के बाद तो मतदाता का मिजाज अचानक बदल जाने का सवाल ही नहीं उठता!

किसी भी एग्जिट पोल ने उत्तर प्रदेश में भाजपा को दौ सौ से ऊपर और सपा-कांग्रेस को सौ से कम पर नहीं बताया था। जाहिर है, पहले की रायशुमारी क्या, एग्जिट पोल भी वास्तविक परिणाम की झलक नहीं दे सके। पंजाब में हवा के रुख को देखते हुए अकाली-भाजपा गठबंधन की भारी पराजय का महीनों पहले से पूर्वानुमान कोई भी लगा सकता था। सर्वे एजेंसियों का इम्तहान तो अन्य तथ्यों से ही हो सकता है। अमूमन सभी वहां कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को बराबरी पर दिखा रहे थे। कोई-कोई तो आप की सरकार भी बनवा चुका था। पर नतीजा आया तो आप को न पहले के सर्वेक्षणों के मुताबिक सीटें हासिल हुर्इं न एग्जिट पोल के मुताबिक। और पंजाब में कांग्रेस को इतनी सीटें मिलीं जैसे वह आप से कड़े मुकाबले में न फंसी रही हो बल्कि उसकी लहर चली हो। गोवा में भी किसी-किसी सर्वे ने आम आदमी पार्टी को सबसे अव्वल बताया था, उसे प्रमुख प्रतिस्पर्धी मान कर तो सभी चल रहे थे। अलबत्ता एग्जिट पोल में उसे दो से चार सीटें ही मिलती बताई गई थीं। मगर उसका खाता तक नहीं खुला।

उत्तराखंड में भाजपा की जीत का अनुमान लगाना कठिन नहीं था। लेकिन सवाल है कि किस सर्वे ने भाजपा को इतनी ज्यादा और कांग्रेस को इतनी कम सीटें मिलने की भविष्यवाणी की थी? एक एग्जिट पोल ने तो उत्तराख्रंड में भाजपा और कांग्रेस, दोनों को उनतीस से पैंतीस सीटें मिलने की भविष्यवाणी की थी! जो खबरिया चैनल इन सर्वेक्षणों को दिन-रात खबर की तरह बड़े जोश-खरोश से परोसते रहते हैं उनके पास रिपोर्टरों का अपना विशाल तंत्र होता है। वे भी जमीनी हकीकत को क्यों नहीं भांप सके? विडंबना यह है कि इतनी बार और इतने बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण गलत साबित होने पर भी कोई जवाबदेही नहीं लेता, न कोई खेद प्रकट करता है, बल्कि अगले चुनाव में सर्वे का बाजार फिर गर्म हो जाता है!

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First Published on March 13, 2017 5:35 am

  1. J
    Janardhan Rao
    Mar 13, 2017 at 10:22 pm
    इंडिया टुडे और टुडे'स चाणक्य का सर्वे लगभग ी निकले. जिन्होंने ने ईमानदारी के किया उनका सटीक निकल.
    Reply

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