May 29, 2017

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संपादकीय: बेमानी बोल

केजरीवाल खुद सोचें कि उन्होंने जो कहा उसने भारतीय सेना का हौसला बढ़ाने और सरकार की इच्छाशक्ति के साथ खड़े होने में कितनी भूमिका निभाई और कितना वे पाकिस्तान के मददगार बन गए।

Author October 5, 2016 06:19 am
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (फाइल फोटो)

उड़ी के सैन्य शिविर पर आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना की ओर से किए गए सर्जिकल स्ट्राइक और फिर पाकिस्तान के रवैए पर देश के लगभग सभी नेता अपने तमाम मतभेदों को किनारे रख कर एकजुट दिख रहे थे। ऐसे में दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने अपने एक उलझे बयान के जरिए पाकिस्तान को राहत पहुंचाने में मदद की। यों उनका बयान पहली नजर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रुख का समर्थन ही लगता है, जिसमें उन्होंने मोदी की इच्छाशक्ति की तारीफ करते हुए उन्हें सलाम करने की बात कही है। लेकिन इसके बाद लगे हाथ जिस तरह उन्होंने भारत के खिलाफ पाकिस्तान के झूठे प्रचार को बेनकाब करने के लिए सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत पेश करने की अपील की, उससे पाकिस्तान कोे जैसे संजीवनी मिल गई।

पाकिस्तान ने बिना कोई देरी किए अरविंद केजरीवाल को उनकी राय के साथ पेश करना शुरू कर दिया। अब केजरीवाल खुद सोचें कि उन्होंने जो कहा उसने भारतीय सेना का हौसला बढ़ाने और सरकार की इच्छाशक्ति के साथ खड़े होने में कितनी भूमिका निभाई और कितना वे पाकिस्तान के मददगार बन गए। केजरीवाल के अलावा कांग्रेस नेता पी चिंदबरम ने भी सैन्य अभियान पर संदेह जताया था। गौरतलब है कि भारतीय सेना की ओर से पाकिस्तान की सीमा पर सर्जिकल स्ट्राइक की खबर आई तो इससे देश में यह संदेश गया कि अगर आतंकवादियों और उनके संरक्षकों ने देश के जवानों को निशाना बनाया है, तो उन्हें करारा जवाब दिया जाएगा। यहां तक कि लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने एक सुर में भारतीय सेना और सरकार के प्रति अपना समर्थन जताया और दुनिया भर में आतंकवाद को बढ़ावा देने के सवाल पर पाकिस्तान अलग-थलग पड़ गया। मगर यह समझना मुश्किल है कि ऐसे वक्त में अरविंद केजरीवाल को ऐसा कुछ बोलने की जरूरत क्यों पड़ी, जो पाकिस्तान के लिए सहारा बन जाए।

यह सही है कि सर्जिकल स्ट्राइक जैसे अभियान को जिस तरह बेवजह बढ़-चढ़ कर प्रचारित किया गया, उसे निहायत गैरजरूरी उत्साह के तौर पर देखा जाना चाहिए। देश की सीमा पर सुरक्षा या फिर आतंकवादियों की घुसपैठ जैसे हालात से निपटने के लिए ऐसे सैन्य अभियान समय-समय पर अंजाम दिए जाते रहे हैं। लेकिन शायद ही कभी उनका इस कदर प्रचार किया गया। यह देश और यहां के नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा मामला है और इस मसले की गंभीरता को समझा जाना चाहिए। जिस सैन्य अभियान के सबूत पेश करने की बात कही जा रही है, उसके ब्योरे सार्वजनिक करना राजनीतिक और रणनीतिक रूप से देश के लिए जोखिम उठाने जैसा साबित हो सकता है। मगर इस समूचे मामले की संवेदनशीलता को समझे बगैर अगर इसके ब्योरे और सबूत सार्वजनिक करने की मांग की जाती है, तो इसे एक बेहद अपरिपक्व रवैया कहा जा सकता है। खासतौर पर इसलिए भी कि अरविंद केजरीवाल और पी चिंदबरम जैसे चेहरों को भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में महत्त्वपूर्ण शख्सियत के तौर पर देखा जाता है। अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री जैसे शीर्ष पद की जिम्मेदारी निभा रहे हैं और चिदंबरम देश के गृहमंत्री और वित्तमंत्री जैसे अहम पदों पर रह चुके हैं। इसलिए इन्हें न केवल देश और उसके तंत्र की जरूरतों के मद्देनजर, बल्कि अपने पद और कद का खयाल रखते हुए भी इस तरह की दोहरे अर्थों वाली बातें नहीं करनी चाहिए, जो अपने ही देश के लिए नुकसानदेह साबित होने लगें।

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First Published on October 5, 2016 4:40 am

  1. M
    milind
    Oct 5, 2016 at 2:01 pm
    .राजनिति का स्तर इतना नीचा हो सकता है जहॉ एक जिम्मेदार व्यक्ति निहित स्वार्थ वश देश विरोधी शक्ति के हााथो अपनी राजनिति चलाने मे संकोच नही करता
    Reply
    1. M
      Manoj Rajput
      Oct 5, 2016 at 10:53 am
      इन दोनों को अपने पैदावार का सबुत देना चाहिए
      Reply

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