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किसका कल्याण

भारत में सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के किस्से हर कहीं मिल जाएंगे। पर यह सबसे ज्यादा उन मामलों में होता रहा है जिनमें धनराशि गरीबों के कल्याण के मद में संचित या आबंटित की गई होती है।
Author November 7, 2017 03:46 am
सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण रिर्पोट के अनुसार, ‘गरीबी ने आज भी देश के तीस फीसद आबादी को अपने चंगुल में जकड़ रखा है। (रॉयटर्स फोटो)

भारत में सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के किस्से हर कहीं मिल जाएंगे। पर यह सबसे ज्यादा उन मामलों में होता रहा है जिनमें धनराशि गरीबों के कल्याण के मद में संचित या आबंटित की गई होती है। क्या ऐसा इसलिए होता है कि तमाम लाभार्थियों को उनसे संबंधित योजना में कुछ खास मालूम नहीं होता, या उन्हें चुप कराना आसान होता है? इस तरह के गोरखधंधे की एक ताजा मिसाल निर्माण श्रमिकों के लिए संचित निधि का बेजा इस्तेमाल है। श्रमिकों के हितों की खातिर जमा की गई उनतीस हजार करोड़ रुपए की राशि में से लैपटॉप और वाशिंग मशीन खरीदे जाने का मामला सामने आया है। गौरतलब है कि यह सरकार के आलोचक किसी संगठन या किसी विपक्षी दल का आरोप नहीं है, बल्कि खुद कैग यानी नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक ने सर्वोच्च न्यायालय में दिए अपने हलफनामे में बताया है। कैग ने यह भी कहा है कि उपर्युक्त निधि से दस फीसद राशि भी वास्तविक उद््देश्य यानी निर्माण श्रमिकों के कल्याण के लिए खर्च नहीं की गई।

एक गैर-सरकारी संगठन की ओर से दायर की गई याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने कैग से कहा था कि वह इस बारे में रिपोर्ट पेश करे कि निर्माण श्रमिकों के हितों के मद््देनजर संचित धनराशि का किस प्रकार इस्तेमाल किया गया। कैग ने इस बारे में रिपोर्ट पेश की तो अदालत हैरान रह गई। रिपोर्ट से पता चला कि निर्माण श्रमिकों के नाम पर इकट्ठा की गई राशि से लैपटॉप और वाशिंग मशीनें खरीदी गर्इं। यह तथ्य जानकर हैरान अदालत ने केंद्रीय श्रम सचिव को दस नवंबर से पहले हाजिर होकर यह बताने को कहा है कि निर्माण श्रमिक कल्याण अधिनियम कैसे लागू किया गया और क्यों उसका दुरुपयोग हुआ। अदालत ने 2015 में भी हैरानी जताई थी जब उसे पता चला था कि निर्माण श्रमिकों के लिए जमा छब्बीस हजार करोड़ रुपए की राशि बिना इस्तेमाल के पड़ी है। गौरतलब है कि निर्माण श्रमिकों से संबंधित कल्याण निधि रीयल एस्टेट कंपनियों पर सेस यानी उप-कर लगा कर जमा की गई थी। जाहिर है, इस उप-कर का भार अंतत: रीयल एस्टेट क्षेत्र के ग्राहकों या आम निवेशकों पर पड़ा होगा। लेकिन उप-कर के राजस्व को जहां पहुंचना था नहीं पहुंचा। इस तरह निर्माण श्रमिकों का हक हड़पने के अलावा करदाताओं के साथ भी ज्यादती हुई है। अगर विस्तृत छानबीन हो तो केंद्र से लेकर राज्यों तक तमाम श्रम कल्याण बोर्डों की भूमिका संदिग्ध नजर आएगी।

हो सकता है कि केंद्रीय श्रम सचिव का जवाब सामने आने के बाद अदालत आगे जांच के बारे में सोचे, जो कि होनी ही चाहिए। पर इसी के साथ यह सवाल भी उठता है कि कैग की रिपोर्ट के जरिए निधि के बेजा इस्तेमाल का खुलासा होने के बाद केंद्र ने खुद जांच की पहल अब तक क्यों नहीं की है। श्रम सचिव को अगली सुनवाई में बताना चाहिए कि सरकार चाहे जिस एजेंसी से मामले की जांच कराने को तैयार है और एक समय-सीमा के भीतर उसकी रिपोर्ट आ जाएगी। पर सवाल यह भी है कि निधि के दुरुपयोग की भनक केंद्रीय श्रम मंत्रालय को क्यों नहीं लग पाई? क्या इस निधि को लेकर निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं थी? सर्वोच्च न्यायालय ने कैग की रिपोर्ट को देखते हुए कहा है कि अगर यह धन की हेराफेरी का मामला न भी हो, तब भी यह धन के दुरुपयोग का मामला तो है ही। पर हो सकता है यह अनुमान से कहीं अधिक गंभीर अनियमितता साबित हो।

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  1. S
    Shivanshu rai
    Nov 7, 2017 at 10:45 am
    सुप्रीम कोर्ट मे एक NGO की ओर से दाखिल याचिका की सुनवाई के दौरान  निर्माण श्रमिकों  के संबंध मे जो कैग की रिर्पोट आयी है ,हैरान करती है की विकास और प्रगती के दावे किये जाते है रोज रोज किये जाते है पर किसकेलिए? र सवाल यह भी है कि निधि के दुरुपयोग की भनक केंद्रीय श्रम मंत्रालय को क्यों नहीं लग पाई ? बिडंबना यही है की आजादी से लेकर अब तक गरीबो के कल्याण हेतु जारी निघि का १० भी खर्च नही किया गया और न ही उसपर निष्पछ जाच हुई ,यही मूल कारण है हम अपने पडोसी देशो से भी पिछडते जा रहे । देखते है सरकार इस मा े मे क्या कदम उठाती है?े
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