December 06, 2016

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संसद में जैसी एकजुटता दिखी थी, वैसी सड़क पर कायम नहीं रही।

Author नई दिल्ली | November 29, 2016 05:14 am
लेफ्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पुदुच्चेरी में मंगलोर एक्सप्रेस ट्रेन को रोक कर विरोध-प्रदर्शन किया (फोटो-PTI)

नोटबंदी को लेकर जहां लोगों को हो रही परेशानियों का सिलसिला जारी है, वहीं सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच रस्साकशी भी। नोटबंदी पर संसद में सरकार को लगातार घेरने की कोशिश में विपक्ष सोमवार को सड़क पर भी उतर आया। बीते हफ्ते संसद में सरकार को घेरने के साथ ही विपक्ष के दो सौ से अधिक सांसदों ने संसद भवन परिसर में धरना भी दिया था। अलबत्ता संसद में जैसी एकजुटता दिखी थी, वैसी सड़क पर कायम नहीं रही। कुछ हद तक यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि जो पार्टियां एक दूसरे की प्रतिद्वंद्वी हैं वे भरसक एक मंच पर या कंधे से कंधा मिला कर चलते नहीं दिखना चाहतीं। मसलन, बंगाल में वाम मोर्चे और तृणमूल कांग्रेस के बीच यही रिश्ता है। यही हाल उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का है। इनके विरोधाभास के अलावा सत्तापक्ष इस बात को लेकर पहले से ही राहत महसूस कर रहा है कि जनता दल (यू), बीजू जनता दल और टीआरएस जैसी पार्टियों ने संसद के भीतर भी नोटबंदी के मसले पर अपने को बाकी विपक्ष के रुख से अलग रखा है।

साफ है कि सरकार को कमजोर विपक्ष का लाभ मिल रहा है। लेकिन इस तसल्ली के बावजूद सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें देखी जा सकती हैं। दरअसल, नोटबंदी ने जन-जीवन इतना अस्त-व्यस्त कर रखा है कि यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि सब कुछ सरकार की उम्मीदों के अनुरूप ही रहेगा। कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री ने हालात सामान्य होने के लिए पचास दिन का समय मांगा था। पर तीन हफ्ते बीतते-बीतते चारों तरफ नाराजगी और शिकायत का आलम है। दरअसल, लोगों ने समझा था कि समस्या सिर्फ कतार में लगने की है, और कुछ ही दिन में कतार की तकलीफ कम हो जाएगी। लेकिन कतार नहीं, अब असली मार बैंकों में नकदी उपलब्ध न होने की है। जब कई दिन से लगातार बैंक नकदी न होने की तख्ती लगा रखे हों, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोगों पर क्या गुजर रही होगी। प्रधानमंत्री ने रविवार को ‘मन की बात’ के अपने संबोधन में नोटबंदी के फैसले को जायज ठहराते हुए कहा कि उनका सपना नगदी-रहित समाज बनाने का है। वे अपनी इस योजना को आगे बढ़ाएं इस पर भला किसी को क्या एतराज हो सकता है? पर यह काम नकदी का संकट पैदा करके नहीं किया जाना चाहिए। इसे प्रोत्साहन और जन-जागरूकता के जरिए ही किया जाना ठीक होगा, वरना थोपी गई तेजी पर उलटी प्रतिक्रिया भी हो सकती है।

भारत में निजी उपभोग की करीब पंचानबे फीसद खरीदारी नगद होती है। क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करने वालों की तादाद सिर्फ ढाई करोड़ है। जारी किए गए एटीएम कार्डों में से ज्यादातर का इस्तेमाल सिर्फ पैसा निकालने के लिए होता है। जहां बड़े पैमाने पर गरीबी हो, अशिक्षा हो, बचत बहुत मामूली हो, वहां पूरे समाज को एकाएक बाजार में प्लास्टिक मनी इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करना आसान नहीं हो सकता। खुदरा बाजार के अधिकतर दुकानदारों को भी, जिनकी विशाल संख्या है, कंप्यूटरीकृत लेन-देन के लिए तुरंत तैयार और प्रशिक्षित करना कैसे संभव है! हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि देश के बहुत सारे हिस्सों में न तो बिजली की अबाध आपूर्ति रहती है न सुचारु नेट कनेक्टिविटी। पहले ये सुविधाएं सुनिश्चित करने पर ध्यान देना होगा। फिर, एक बड़ी चुनौती यह भी है कि नोटबंदी के फलस्वरूप आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित होने से लेकर कृषि समेत अर्थव्यवस्था पर जो बुरा असर पड़ने के संकेत दिख रहे हैं, उनसे सरकार कैसे पार पाएगी!

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First Published on November 29, 2016 5:14 am

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