December 03, 2016

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परीक्षा के दिन

अर्थतंत्र को काले धन से मुक्त देखने की लोगों की इच्छा का नतीजा है कि वे अंतहीन परेशानियां खामोशी से सह ले रहे हैं।

Author December 2, 2016 00:27 am
किताबे (फाइल फोटो)

सरकार नोटबंदी के बाद लगातार यह आश्वासन देती रही है कि सब कुछ जल्दी ही सामान्य हो जाएगा। लोग इसी भरोसे पर कतारों में लगते और इंतजार करते रहे। दावा किया जाता रहा कि कतारें छोटी पड़ने लगी हैं। लेकिन कतारें छोटी पड़ने का असल या अधिकांश कारण बैंकों में नकदी की किल्लत जारी रहना था। उम्मीद थी कि वेतनभोगी वर्ग के गुजारे का खयाल कर एक दिसंबर से पहले-पहले या तो बैंकों में पर्याप्त नगदी आ जाएगी, या वेतन का कुछ हिस्सा नकदी के तौर पर उपलब्ध कराया जाएगा। पर न तो बैंकों में पर्याप्त नगदी आ सकी, न वेतन का कुछ हिस्सा नगद पाने की उम्मीद पूरी हो पाई। अलबत्ता कई दफ्तरों में एटीएम वैन पहुंचाए जाने की खबर है, पर एक दिन में जब नकद निकासी की सीमा सिर्फ ढाई हजार या तीन हजार हो तो राहत कितनी मामूली है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। महीने की पहली तारीख आते ही वेतनभोगी तबके पर खर्च का पहाड़ टूट पड़ता है। मकान के किराए से लेकर दूध, बिजली बिल और कई तरह की उधारी के खर्चे उसे चुकाने होते हैं। पहले सप्ताह में ही उसका बजट तय होता है। फिर इस बार तो खर्च का भार और बढ़ा हुआ है, क्योंकि तमाम लोगों ने नकदी न रहने से अपने अनेक काम रोक रखे हैं।

लिहाजा, बुधवार का दिन सरकार के लिए अग्निपरीक्षा का दिन था। क्या वह इसमें खरी उतर सकी? सुबह होते ही बैंकों और एटीएम के आगे लंबी लाइनें लग गर्इं। ज्यादातर जगहों पर नगदी जल्द ही खत्म हो गई और बहुत-से लोगों को निराश लौटना पड़ा। दिल्ली-एनसीआर में लोगों की नाराजगी कई जगह बैंककर्मियों से कहासुनी के रूप में फूटी। लिहाजा, कर्मचारियों ने सुरक्षा के लिए पुलित तैनात करने की मांग की है। जब शहरों में यह हाल है तो ग्रामीण क्षेत्रों की तकलीफों की कल्पना की जा सकती है जहां नगदी की किल्लत और भी विकट है तथा कैशलेस भुगतान की सुविधा दूर-दूर तक नदारद है। इस सब से एक बार फिर यह चर्चा जोर पकड़ी है कि विमुद्रीकरण की घोषणा से पहले उसे लागू करने की पूरी तैयारी क्यों नहीं की गई। चलन वाली कुल मुद्रा में हजार और पांच से के नोटों का कुल मूल्य छियासी फीसद था। छियासी फीसद मुद्रा एकाएक अमान्य हो जाए, तो अफरातफरी क्यों नहीं मचेगी!

यह तो देश के अर्थतंत्र को काले धन से मुक्त देखने की लोगों की इच्छा का नतीजा है कि वे अंतहीन परेशानियां खामोशी से सह ले रहे हैं। वरना सरकार की तैयारी का आलम यह है कि आए दिन उसकी घोषणाओं और फैसलों में फेरबदल होता रहता है। रिजर्व बैंक ने अभी तक बारह बार अपनी अधिसूचनाएं बदली हैं। निकासी राशि की सीमा और अवधि को लेकर गफलत बनी रहती है। सरकार हर एक-दो दिन पर राहत का दायरा बढ़ाने की घोषणा करती है, पर वह शायद ही लागू हो पाती है, क्योंकि उतनी नकदी ही नहीं होती। हर शिकायत का जवाब यह नहीं हो सकता कि लोग डिजिटल तरीके से भुगतान करें। यह मामला देश के हर व्यक्ति से ताल्लुक रखता है, न कि एक छोटे-से तबके से। यह सही है कि नकदी के संकट और सरकार के रुख को देखते हुए इलेक्ट्रॉनिक तरीके का उपयोग तेजी से बढ़ा है, पर फौरन यह देशव्यापी नहीं हो सकता। लिहाजा, सरकार को नगदी उपलब्ध कराने का काम युद्धस्तर पर करना चाहिए।

 

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First Published on December 2, 2016 12:24 am

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