March 27, 2017

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संपादकीय: बेहतरी की मुद्रा

पिछले करीब छह सालों से महंगाई के चलते बैंक दरें ऊंची रखने का नतीजा यह हुआ था कि उद्योगों का कारोबार मंद पड़ गया।

Author October 6, 2016 05:27 am
RBI गवर्नर उर्जित पटेल

भारतीय रिजर्व बैंक ने नीतिगत दर में अचानक पच्चीस आधार अंक की कटौती करके उद्योग जगत को हैरान कर दिया। यह रिजर्व बैंक के नए गवर्नर उर्जित पटेल की पहली मौद्रिक समीक्षा है। इस फैसले से माना जा रहा है कि लोगों के लिए मकान, दुकान और वाहन खरीदना सस्ता हो जाएगा। पैसे की तरलता कुछ बढ़ेगी और उपभोक्ता मांग पर सकारात्मक असर पड़ेगा। इससे बाजार की चमक कुछ बढ़ेगी। सरकार उत्साहित है कि वह आर्थिक विकास के अपने आठ फीसद के लक्ष्य को आसानी से प्राप्त कर लेगी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी चालू वित्त वर्ष में भारत की विकास दर 7.6 फीसद रहने का अनुमान पेश किया है।

पिछले कुछ सालों से बढ़ती महंगाई के मद्देनजर बैंक दरें ऊंची रखने की नीति पर अमल किया जा रहा था। मगर इस साल मानसून बेहतर होने, दलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें न बढ़ने के चलते महंगाई पर काबू पाने का भरोसा जगा है। रिजर्व बैंक का दावा है कि अगली तिमाही तक महंगाई की दर पांच फीसद तक सिमट जाएगी और चालू वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही तक यह चार फीसद पर आ जाएगी। बैंक दरें अधिक होने की वजह से उद्योग जगत के लिए कारोबार में मुश्किलें पेश आ रही थीं। इसलिए रेपो दर में पच्चीस आधार अंक की कटौती से स्वाभाविक ही उसमें उत्साह दिखाई दे रहा है। इस फैसले से बाजार में चमक लौटने की उम्मीद इसलिए भी बनी है कि यह त्योहारों का मौसम है और सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें हाल ही में लागू हुई हैं। ब्याज दरें घटने से खासकर वाहन और मकान-दुकान की खरीद में बढ़ोतरी होगी।

पिछले करीब छह सालों से महंगाई के चलते बैंक दरें ऊंची रखने का नतीजा यह हुआ था कि उद्योगों का कारोबार मंद पड़ गया। अनेक क्षेत्रों का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। विश्व बाजार में वस्तुओं की मांग कम होती गई। जबकि मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए सभी क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन की आवश्यकता होती है। इसलिए रिजर्व बैंक की नीतिगत दरों में कटौती के बावजूद इस बात की उम्मीद बहुत नहीं की जा सकती कि निजी निवेशक बहुत उत्साहित होंगे। कर्ज सस्ते होने से कारोबार में गति आने की संभावना तो जताई जा रही है, पर यह काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि बैंक अपने ग्राहकों को इसका कितना लाभ देंगे।

बैंकों की वित्तीय स्थिति खराब है। सार्वजनिक बैंकों का बहुत सारा पैसा गैर-निष्पादित संपत्ति के तौर पर रुका हुआ है। इसकी वजह से वे नए कर्ज लेने वालों को भले नई दरों पर कर्ज उपलब्ध कराएं, पुराने कर्जदारों को इसका लाभ देंगे, कहना मुश्किल है। ब्याज दरों में बदलाव के लिए बैंक अपनी पूंजी के प्रवाह को ध्यान में रखते हुए कोई फैसला करेंगे। इस तरह उन लोगों पर भी असर पड़ेगा, जो ब्याज के लिए बैंकों में छोटी बचत करते हैं। ऐसे में सरकार के सामने बैंकों का रुका हुआ कर्ज वापस लौटाने की चुनौती बनी हुई है। रिजर्व बैंक ने खराब ऋणों से निपटने के लिए रचनात्मक प्रयास की जरूरत पर बल दिया है। अगर रिजर्व बैंक इस दिशा में कामयाबी हासिल कर लेता है, तो कारोबारी गतिविधियों को बढ़ावा देने में काफी मदद मिलेगी। तब बैंक दरों के जरिए महंगाई पर काबू पाने और बाजार में चमक बनाए रखने के लिए बार-बार बैंक दरों में बदलाव का फैसला नहीं करना पड़ेगा।

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First Published on October 6, 2016 5:27 am

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