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संपादकीयः इरोम का फैसला

इरोम शर्मिला के अचानक अपना अनशन समाप्त करने और मणिपुर विधानसभा का चुनाव लड़ने के एलान से उनके सहयोगियों को भी हैरानी हुई।
Author July 28, 2016 03:16 am
इरोम शर्मिला

इरोम शर्मिला के अचानक अपना अनशन समाप्त करने और मणिपुर विधानसभा का चुनाव लड़ने के एलान से उनके सहयोगियों को भी हैरानी हुई। मगर उनका यह कदम उचित है। इरोम शर्मिला पिछले करीब सोलह सालों से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून यानी अफस्पा हटाने की मांग को लेकर अनशन पर हैं। इस बीच उनके साथ अनेक संगठन भी आ खड़े हुए और देशव्यापी विरोध का स्वर उभरा। मगर इस दिशा में अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया है। इरोम शर्मिला को इस बीच खुदकुशी के प्रयास के आरोप में कई बार गिरफ्तार किया गया और उन्हें एक अस्पताल में कैद कर नाक में नली डाल कर भोजन दिया जाता रहा।

उनके विरोध की गूंज दुनिया भर में सुनी गई, पर व्यावहारिक स्तर पर कोई नतीजा नहीं निकल सका। इन अनुभवों से इरोम को यकीन हो गया कि वे आजीवन अनशन पर बैठी रहेंगी तो भी शायद उसका असर नहीं होने वाला है। इसलिए उन्होंने सीधे राजनीति में आकर इस मसले को हल करने का विचार किया। अफस्पा देश के विभिन्न अशांत इलाकों में सशस्त्र बलों को असीमित अधिकार देने के मकसद से बनाया गया था। इसके तहत सुरक्षा बलों को किसी भी व्यक्ति को शक की बिना पर गिरफ्तार करने और गोली तक मार देने का अधिकार है।

खासकर जम्मू-कश्मीर के आतंकवाद प्रभावित इलाकों और मणिपुर आदि में सेना को कई बार इस कानून का दुरुपयोग करते देखा गया है। इसे लेकर जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में लंबे समय से आवाज उठती रही है। सर्वोच्च न्यायालय भी सेना को चेतावनी दे चुका है कि वह अतिवादियों से निपटने के नाम पर युद्ध जैसी स्थिति नहीं पैदा कर सकती। इस कानून के जरिए मानवाधिकारों के उल्लंघन पर एमनेस्टी इंटरनेशनल भी एतराज जता चुका है, मगर केंद्र इस कानून में बदलाव को लेकर हमेशा हिचकता रहा है।

यों कानून-व्यवस्था राज्यों का मामला है और इसे वे पुलिस के जरिए सुनिश्चित करने का प्रयास करते रहे हैं। किन्हीं विशेष परिस्थितियों में ही सेना का सहारा लिया जाता रहा है। मगर जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में अलगाववादी संगठनों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए सेना को तैनात किया गया और उन्हें विशेषाधिकार दिए गए। केंद्र को लगता रहा है कि जिस तरह अलगाववादी संगठन ताकतवर होते गए हैं, उनसे निपट पाना राज्य पुलिस के बूते की बात नहीं है। इसलिए वह सेना को एकदम हटाने से बचती रही है। जम्मू-कश्मीर में काफी विरोध के बाद सेना को कुछ इलाकों से चरणबद्ध रूप में हटाने का फैसला किया गया था, पर आतंकी घटनाओं को देखते हुए उस पर पूरी तरह अमल कर पाना कठिन हो गया। इरोम अलगाववादी संगठनों पर नकेल कसने के खिलाफ नहीं हैं।

वे सशस्त्र बलों को दिए गए असीमित अधिकार को सीमित करने की मांग करती रही हैं। इस पर सरकार को क्यों एतराज होना चाहिए! आखिर किसी को भी असीमित अधिकार मिल जाने के बाद उसके निरंकुश होने की आशंका बनी रहती है। सेना पर भी मानवाधिकारों के उल्लंघन के अनेक दाग हैं। कोई भी सुरक्षा बल हो, उसका चेहरा मानवीय होना चाहिए। खासकर आम नागरिकों के बीच काम करते हुए उससे वैसे ही व्यवहार की उम्मीद नहीं की जाती, जैसा सीमा पर दुश्मन सेना के साथ लड़ते हुए होता है। ऐसे अनेक कानूनों में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं, जिनसे सामान्य नागरिकों का जीवन प्रभावित होता है, फिर अफस्पा पर पुनर्विचार करने में क्या हर्ज है!

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  1. सुभाष
    Jul 28, 2016 at 2:58 am
    क्या सेना अपनी मर्जी से मणिपुर गयी?आतंकियों को गड़बड़ करने के क्या-क्या अधिकार/अवसर प्राप्त हैं?सेना को उनसे अधिक अधिकार क्यों नहीं होने चाहिएं?
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