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सहमति की सूरत

आज से संसद का शीत सत्र शुरू हो रहा है। हालांकि इस बार भी असहिष्णुता आदि को लेकर स्थितियां हंगामे की हो सकती हैं, पर सरकार विपक्ष के साथ बातचीत करके जरूरी विधेयकों पर सहमति बनाने की रणनीति बना रही है।
Author November 25, 2015 23:50 pm

आज से संसद का शीत सत्र शुरू हो रहा है। हालांकि इस बार भी असहिष्णुता आदि को लेकर स्थितियां हंगामे की हो सकती हैं, पर सरकार विपक्ष के साथ बातचीत करके जरूरी विधेयकों पर सहमति बनाने की रणनीति बना रही है। पिछले सत्रों में हंगामे के चलते कई अहम विधेयक पारित नहीं हो पाए। उनमें से भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक को सरकार ने खुद छोड़ दिया है, मगर वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी संबंधी विधेयक को पारित कराना उसके लिए जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिंगापुर में कहा कि उनकी सरकार विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को आसान बनाने के मद्देनजर अगले वित्त वर्ष से जीएसटी अधिनियम लागू कर देगी।

इधर वित्तमंत्री अरुण जेटली ने एसोचैम में कहा कि वे कांग्रेस और दूसरे दलों के साथ बातचीत कर इस विधेयक से जुड़े मतभेदों को दूर करने का प्रयास करेंगे। हालांकि उन्होंने कांग्रेस को यह भी सुझाव दिया कि उसे अपनी आपत्तियों पर फिर से विचार करने की जरूरत है। इसमें दो राय नहीं कि जीएसटी यानी केंद्रीय कर प्रणाली लागू होने से उपभोक्ताओं पर अप्रत्यक्ष करों का बोझ कम होगा। फिलहाल केंद्र और राज्यों के कुल मिला कर बीस प्रकार के अप्रत्यक्ष कर चलन में हैं। हर राज्य में करों का ढांचा अलग-अलग है।

जीएसटी लागू होने के बाद ये सभी कर एक में समाहित हो जाएंगे। इस तरह वस्तुओं के उत्पादन, वितरण और बिक्री में लगने वाले अलग-अलग करों की झंझट खत्म हो जाएगी। राज्यों को भय था कि जीएसटी लागू होने के बाद उनके राजस्व पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, मगर उनकी यह चिंता दूर करते हुए प्रावधान किया गया कि शुरुआती सालों में राज्यों को होने वाले नुकसान की भरपाई केंद्र सरकार करेगी। इस तरह जीएसटी का रास्ता आसान लगने लगा था। मगर नरेंद्र मोदी सरकार ने यूपीए सरकार के समय तैयार विधेयक में कुछ बदलाव कर दिए, जिन्हें लेकर विपक्ष को एतराज है।

जीएसटी विधेयक के जिन बिंदुओं पर विपक्ष को एतराज है, उनमें मुख्य रूप से राज्य सरकारों को वस्तुओं और सेवाओं के अंतरराज्यीय आवागमन पर अलग से शुल्क वसूलने का अधिकार दिया जाना है। यह सवाल वाजिब है कि जब केंद्र सरकार राज्यों को उनके राजस्व घाटे की पूरी भरपाई को वचनबद्ध है तो फिर अलग से शुल्क वसूलने का अधिकार क्यों होना चाहिए। अक्सर कंपनियों को किसी उत्पाद या फिर अपनी सेवाओं के लिए वस्तुओं को कई बार एक राज्य से दूसरे राज्य की सीमा से लाना-ले जाना पड़ता है। इस तरह उन्हें हर बार अतिरिक्त शुल्क अदा करना पड़ेगा।

स्वाभाविक है, इस तरह जीएसटी के जरिए वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित करने का संकल्प कमजोर साबित होगा। मगर लगता नहीं कि सरकार इस बिंदु में बदलाव को तैयार है। यह कर लगाने का प्रस्ताव गुजरात सरकार का था। यूपीए सरकार के समय इसकी दर दो प्रतिशत रखने की मांग थी, मगर तब उसे स्वीकार नहीं किया गया। नरेंद्र मोदी सरकार ने बीच का रास्ता निकालते हुए विधेयक में संशोधन करके इस दर को एक प्रतिशत कर दिया।

इस शुल्क को लागू करना राज्य सरकारों के लिए तो फायदेमंद हो सकता है, पर इसे न उद्योग समूहों के हित में कहा जा सकता है और न उपभोक्ता के। इसका बोझ आखिरकार उपभोक्ता पर पड़ेगा। इसलिए सरकार जीएसटी के व्यावहारिक पहलुओं पर लचीला रुख अपनाते हुए विपक्ष से बातचीत करे, तभी इस महत्त्वाकांक्षी विधेयक पर सहमति की सूरत बन सकती है।

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