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पानी पर पहल

कुछ बरसों से पर्यावरण संरक्षण की बाबत ज्यादा चिंता अदालतों ने दिखाई है। सरकारों की दिलचस्पी कभी-कभार कुछ छिटपुट कदम उठाने तक सीमित रही है..
Author नई दिल्ली | November 16, 2015 22:48 pm
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

कुछ बरसों से पर्यावरण संरक्षण की बाबत ज्यादा चिंता अदालतों ने दिखाई है। सरकारों की दिलचस्पी कभी-कभार कुछ छिटपुट कदम उठाने तक सीमित रही है। यही नहीं, कई बार वे अपने ही बनाए नियम-कायदों के प्रति लापरवाह नजर आती हैं। ऐसे में एक मंत्री का पर्यावरण संरक्षण के लिए अलग से अभियान चलाना ध्यान खींचने वाली बात है। गौरतलब है कि झारखंड के खाद्यमंत्री सरयू राय अपने नियमित राजकीय दायित्व से समय निकाल कर राज्य की नदियों और जलाशयों को प्रदूषण से बचाने के लिए काम कर रहे हैं। इस निमित्त उन्होंने ‘युगांतर भारती’ नाम से एक संस्था भी बनाई है जो राज्य के अन्य स्वयंसेवी संगठनों के साथ मिल कर जल प्रदूषण के खिलाफ मुहिम चला रही है। इस अभियान के औचित्य में भला किसे संदेह हो सकता है? पर सवाल यह है कि क्या मंत्री महोदय विकास के नाम से चलाई जा रही उन नीतियों और कार्यक्रमों की दिशा बदल पाएंगे, तरह-तरह के प्रदूषण में जिनकी भारी भूमिका है।

झारखंड कोयला समेत कई तरह के खनिज की विशाल संपदा वाला राज्य है। इसके साथ ही, यहां बड़े पैमाने पर सस्ता श्रम भी उपलब्ध रहा है। इन दोनों बातों के चलते झारखंड में अन्य राज्यों की बनिस्बत बहुत पहले औद्योगीकरण शुरू हो गया था। बड़ी-बड़ी कंपनियों ने यहां पैर पसारे। पर दशकों से जारी बेलगाम औद्योगीकरण के चलते जहां राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से क्षरण हुआ है, वहीं तमाम जल-स्रोत भयावह रूप से प्रदूषित होते गए हैं। सुवर्णरेखा और दामोदर जैसी प्रमुख नदियों और इनकी सहायक नदियों का बुरा हाल है। नियम-कायदों को ताक पर रख कर हुए खनन ने भयानक रूप से भूजल को भी प्रदूषित किया है और जलाशयों को भी। उनमें आर्सेनिक, क्रोमियम आदि सेहत के लिए नुकसानदेह पदार्थों की मात्रा बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है। यह अनेक तरह की बीमारियों का सबब है।

प्रदूषित पानी से रोगों के फैलने की स्थिति हमारी सरकारों की संवेदनहीनता की ओर भी इशारा करती है और नीति के स्तर पर उनके दिवालियेपन की तरफ भी। अगर जल-प्रदूषण से निजात मिल जाए, तो इलाज पर होने वाला बहुत-सा सरकारी धन भी बचाया जा सकता है। अगर हमारे नीति-नियंता इस तकाजे को तरजीह नहीं दे रहे हैं, तो इसके खासकर दो कारण हैं। एक तो यह कि विकास की उनकी दृष्टि में केवल वृद्धि-दर का महत्त्व है, जिसके लिए पर्यावरण की बलि चढ़ जाए तो परवाह नहीं। दूसरा कारण पानी के बाजारीकरण का दबाव हो सकता है, जो इस दलील को बढ़ावा देता है कि गैस और तेल की तरह पानी भी एक आर्थिक उत्पाद है। इस तर्क का खोखलापन जाहिर है, क्योंकि पानी सबकी जरूरत है, मनुष्यों की ही नहीं, पशु-पक्षियों और वनस्पतियों की भी। फिर, ऊर्जा के किसी भी स्रोत का विकल्प हो सकता है, पानी का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए पानी की बर्बादी और पानी का प्रदूषण इंसान का अपने वजूद पर कुठाराघात है। पानी धरती की धरोहर है। यानी इसका उपयोग और प्रबंधन इस तरह से होना चाहिए कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी इसका भंडार न सिर्फ बचा रहे, बल्कि उपयोग के लायक भी बना रहे।

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  1. M
    mukesh kumar
    Nov 17, 2015 at 11:36 pm
    शायद जल संसाधन मंत्री इस पहल से उत्साहित होकर कोई कालजयी फैसला लें
    Reply
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