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महंगाई की मार

रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले फलों और सब्जियों की कीमतें बढ़ी हैं, खानपान, तैयार भोजन पर करों की दोहरी व्यवस्था के चलते भी महंगाई बढ़ी है।
Author September 14, 2017 00:15 am
प्रतीकात्मक फोटो। (फाइल)

वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लगाने के पीछे तर्क रहा है कि इससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें घटेंगी। मगर इसके शुरुआती चरण में ही महंगाई पिछले पांच महीने के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। हालांकि अनेक आम उपभोक्ता वस्तुओं पर करों की दर काफी कम रखी गई है, इसके बावजूद खुदरा बाजार में वस्तुओं की कीमतें बढ़ी हैं, तो इसकी वजहों पर ध्यान देने की जरूरत है। कहा जा रहा है कि जीएसटी का शुरुआती चरण होने की वजह से बहुत सारे खुदरा कारोबारी भ्रम में हैं और वे अपने ढंग से वस्तुओं की कीमतें बढ़ा कर बेच रहे हैं। पर थोक मूल्य सूचकांक में महंगाई की दर बढ़ कर 3.36 पहुंच गई, तो यह केवल भ्रम के चलते नहीं हुआ है। रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले फलों और सब्जियों की कीमतें बढ़ी हैं, खानपान, तैयार भोजन पर करों की दोहरी व्यवस्था के चलते भी महंगाई बढ़ी है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि केंद्रीय कर प्रणाली लागू होने के बाद भी अगर महंगाई पर काबू नहीं पाया जा पा रहा, तो इससे पार पाने के क्या उपाय होने चाहिए।

दरअसल, जीएसटी में करों की दर तय करते समय अपेक्षित सावधानी न बरती जाने की वजह से भी गड़बड़ियां पैदा हुई हैं, जिसके चलते सरकार को बार-बार करों की समीक्षा करनी पड़ रही है। जीएसटी की रूपरेखा बनाते समय इसकी अधिकतम दर अठारह फीसद तक रखने का इरादा था। मगर कुछ राज्यों की आपत्ति के कारण इसे बढ़ाना पड़ा। मगर वर्तमान सरकार ने अधिकतम सीमारेखा को बढ़ा कर काफी ऊंचा कर दिया है। कुछ वस्तुओं और सेवाओं पर लगने वाले कर इतने अतार्किक हैं कि उन्हें लेकर आपत्ति बनी हुई है। मसलन ट्रैक्टर पर कर की दर कार से अधिक रखा जाना। इसी तरह मिट्टी से बनी मूर्तियों पर अट्ठाईस फीसद तक कर लगाया जाना। कृषि उत्पाद के भंडारण पर जीएसटी की दर काफी ऊंची है। इससे फल, सब्जियों और रोजमर्रा इस्तेमाल की कई वस्तुओं पर जीएसटी कम होने के बावजूद उनके प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन आदि पर करों की दर ऊंची होने से उनके खुदरा कारोबार में महंगाई बढ़ना स्वाभाविक है।

महंगाई पर काबू पाना और विकास दर को ऊंचे स्तर पर पहुंचाना नरेंद्र मोदी सरकार का संकल्प है। महंगाई काफी हद तक काबू में आती दिखने लगी थी, मगर जीएसटी लगने के बाद न सिर्फ इसने ऊपर का रुख कर लिया, बल्कि विकास दर भी नीचे आ गई। विकास दर में दो फीसद की कमी दर्ज हुई है। जाहिर है, जीएसटी लगने के बाद उत्पादन और विपणन के स्तर पर कमी आई है। नोटबंदी के फैसले के बाद अनेक कारोबार पहले ही प्रभावित हो चुके थे। उसके बाद जीएसटी लागू होने से बहुत सारे कारोबारियों के लिए पंजीकरण कराना और उसके मुताबिक आधुनिक तकनीकी प्रणाली से खुद को जोड़ना टेढ़ी खीर बन गया। हालांकि जीएसटी को लेकर व्याप्त भ्रम दूर करने और गड़बड़ियों पर नजर रखने के लिए मंत्रियों की एक समिति गठित की गई है, मगर फिलहाल खुदरा कारोबारियों के सामने जो मुश्किलें पेश आ रही हैं, उनसे वे कितना निजात दिला पाएंगे, दावा करना कठिन है। सरकार थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर महंगाई का स्तर नापती है, जबकि खुदरा बाजार में वस्तुओं की कीमतें उससे कई गुना अधिक होती हैं। जीएसटी परिषद कर प्रणाली को व्यावहारिक बनाने का प्रयास नहीं करेगा, तो महंगाई और विकास दर को साधना कठिन बना रहेगा।

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