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कूटनीतिक कामयाबी

लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे कई संगठनों का सिरा पाकिस्तान के ठिकानों से जुड़ा हुआ है और वे वहीं से अपनी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हैं।
Author September 5, 2017 04:02 am
9वें ब्रिक्स सम्मेलन में पीएम नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग।

हाल के दिनों में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने के मकसद से भारत ने कूटनीति के मोर्चे पर जिस तरह की कवायदें शुरू की थीं, उनका असर साफ दिखने लगा है। चीन के शियामेन शहर में चल रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन-2017 के ठीक पहले चीन ने स्पष्ट रूप से भारत के लिए यह संदेश जारी किया था कि वहां आतंकवाद और पाकिस्तान से जुड़े सवाल नहीं उठाए जाएंगे। लेकिन सोमवार को ब्रिक्स देशों के इस सम्मेलन में जो संयुक्त घोषणा-पत्र जारी हुआ, उसमें बाकायदा वैश्विक आतंकवाद को लेकर गंभीर चिंता जताई गई और साफ शब्दों में पाकिस्तान के ठिकानों से काम करने वाले लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों को निशाना बनाया गया। शिखर सम्मेलन के साझा बयान में कहा गया है कि हम आतंकवाद के सभी प्रारूपों के खिलाफ हैं; हम ब्रिक्स के सदस्य देशों के अलावा दुनिया भर में कहीं भी आतंकवादी हमलों की निंदा करते हैं। जाहिर है, उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के बीच आमतौर पर अलग-अलग क्षेत्रों में आपसी सहयोग के मसले पर केंद्रित रहने वाले ब्रिक्स सम्मेलन के इस साल के संयुक्त घोषणा-पत्र में आतंकवाद की समस्या पर भारत की चिंताओं को जगह मिलना एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

इस मसले पर सम्मेलन के पहले जिस तरह के द्वंद्व खड़े हुए थे, उसके मद्देनजर निश्चित रूप से इसे भारत की एक शानदार कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा सकता है। खासतौर पर इसलिए भी कि पाकिस्तान और चीन के संबंध फिलहाल बेहतर स्थिति में चल रहे हैं। जब भी पाकिस्तान के खिलाफ कोई अंतरराष्ट्रीय दबाव खड़ा होता है तो चीन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसके बचाव में आगे आ जाता है। भारत ने कई मौकों पर संयुक्त राष्ट्र में जैश-ए-मोहम्मद के सरगना अजहर मसूद को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने की मांग उठाई तो चीन ने दखल देकर भारत को कोशिशों को बाधित किया है। ऐसे में ब्रिक्स के दूसरे सदस्य देशों के साथ-साथ चीन को भी अगर साझा बयान पर राजी होना पड़ा है तो यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि हाल में भारत और चीन के बीच डोकलाम में फौज की तैनाती को लेकर काफी तनाव पैदा हो गया था, जिसे काफी मशक्कत के बाद ढीला किया जा सका।

लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे कई संगठनों का सिरा पाकिस्तान के ठिकानों से जुड़ा हुआ है और वे वहीं से अपनी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हैं। इन बातों के तमाम सबूत होने के बावजूद चीन कभी पाकिस्तान को इस बात के लिए जिम्मेदार मानने को तैयार नहीं होता है। पाकिस्तान के अड्डों से आतंकी कारनामे चलाने वाले इन संगठनों को लेकर दुनिया के कई महत्त्वपूर्ण देशों ने कई बार आपत्ति जताई है। कुछ समय पहले अमेरिका ने भी पाकिस्तान को आतंकवाद के मसले पर सख्त हिदायत दी थी कि वह अपनी जमीन से किसी देश के खिलाफ आतंकी गतिविधियों के संचालित होने पर रोक लगाए। इसी साल के शुरू में फ्रांस ने भी लश्कर-ए-तैयबा और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी समूहों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की बात कही थी। लेकिन विडंबना है कि जब वैश्विक दबाव बढ़ने लगता है तो पाकिस्तान कुछ कदम उठाने की घोषणा करने की औपचारिकता पूरी कर देता है, लेकिन थोड़े ही दिनों के बाद फिर पहले की तरह सब कुछ चलने लगता है। यह बेवजह नहीं है कि अर्थव्यवस्था और दूसरे क्षेत्रों में विकास पर ध्यान देने के बजाय भारत को अपनी काफी ऊर्जा आतंकवाद से जुड़ी समस्याओं से निपटने में गंवानी पड़ती है।

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