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संपादकीयः रणनीतिक संदेश

इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए भारतीय विदेश मंत्रालय के ताजा निर्देश को किस तरह देखा जाए?
Author July 27, 2016 02:37 am

इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए भारतीय विदेश मंत्रालय के ताजा निर्देश को किस तरह देखा जाए? यह निर्देश सिर्फ सुरक्षा के मद्देनजर है या इसका कोई कूटनीतिक मतलब भी है? गौरतलब है कि भारत सरकार ने इस्लामाबाद में अपने उच्चायोग में तैनात राजनयिकों और अधिकारियों से कहा है कि वे इस अकादमिक सत्र से अपने बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था पाकिस्तान से बाहर कर लें। वहां भारतीय उच्चायोग में तैनात कर्मियों के स्कूल जाने वाले बच्चों की कुल तादाद करीब पचास है। निर्देश पहली ही नजर में एक असामान्य कदम लगता है।

इसलिए सहज ही यह सवाल उठता है कि आखिर भारत सरकार ने ऐसा कदम क्यों उठाया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने सफाई के अंदाज में कहा है कि अपने राजनयिक मिशनों के कर्मचारियों और संबंधित नीतियों, जिनमें संबंधित स्थानों की वर्तमान स्थिति भी शामिल है, की समीक्षा करना सभी देशों के लिए सामान्य परिपाटी है। जाहिर है, भारत सरकार चाहती है कि उसके ताजा फैसले को एक परिपाटी के तहत उठाए गए सामान्य कदम के तौर पर देखा जाए। पर यह सामान्य नहीं, एक बड़ा कदम है। तो क्या भारत सरकार ने इसके जरिए पाकिस्तान का कूटनीतिक दर्जा घटाने के संकेत दिए है? क्या पाकिस्तान भी ऐसा ही जवाबी कार्रवाई करेगा? जो हो, सवाल है कि वर्तमान स्थिति की समीक्षा में विदेश मंत्रालय को ऐसा क्या लगा होगा कि भारतीय उच्चायोग के कर्मियों व राजनयिकों को अपने बच्चों की पढ़ाई का प्रबंध पाकिस्तान से बाहर करने के लिए कहना जरूरी जान पड़ा? सुरक्षा संबंधी खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता।

हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के भारतीय सुरक्षा बलों के हाथों मारे जाने के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ गया है और एक बार फिर तनातनी का दौर चल रहा है। खुद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ वानी को शहीद बता चुके हैं, वानी के मारे जाने के विरोध में वहां ‘काला दिवस’ भी मनाया जा चुका है। शरीफ ने यहां तक कह दिया कि कश्मीर एक दिन पाकिस्तान का हिस्सा हो जाएगा। इस सब पर विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने कड़ा प्रतिवाद दर्ज कराते हुए ठीक ही कहा कि कश्मीर कयामत के दिन तक भी पाकिस्तान का हिस्सा नहीं होगा।

बहरहाल, एक धारणा यह भी है कि भारत सरकार ने संबंधित हिदायत इस्लामाबाद में तैनात अपने कर्मियों को पिछले साल जून में ही जारी कर दी थी; उस जानकारी को पाकिस्तान ने ही अब जाकर लीक किया है। अगर यह सूचना या अनुमान सही है, तो ऐसा करने के पीछे पाकिस्तान का क्या इरादा हो सकता है? शायद वह दिखाना चाहता हो कि कश्मीर को लेकर बहुत ही असामान्य स्थिति पैदा हो गई है। संयुक्त राष्ट्र से दखल देने की मांग भी पाकिस्तान कर चुका है। पर न तो संयुक्त राष्ट्र ने कान दिया न पश्चिमी देशों में कोई हलचल हुई। तो क्या सूचना लीक करने का मतलब पश्चिमी देशों का ध्यान खींचने का पाकिस्तान का एक और प्रयास होगा? जो हो, यह दिलचस्प है कि भारत के जिस निर्देश को एक कूटनीतिक कार्रवाई की तरह देखा जा रहा है उसे खुद भारत सरकार परिपाटी के तहत उठाए गए एक सामान्य कदम के तौर पर प्रदर्शित करना चाहती है। तो क्या यह एक मिश्रित रणनीतिक कदम है, जो पाकिस्तान का कूटनीतिक दर्जा घटाने की कार्रवाई भी हो, साथ ही यह संदेश भी कि पश्चिमी देशों को नाहक चिंतित होने की जरूरत नहीं!

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