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समझौते की सीमा

पिछले हफ्ते केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बांग्लादेश के साथ होने वाले भू-सीमा समझौते को मंजूरी दे दी। यह दिलचस्प है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा इस समझौते के खिलाफ थी और इसमें उसे राष्ट्रीय हितों का नुकसान दिख रहा था। यह भी गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब इस समझौते के पक्ष में हैं, जिन्होंने यूपीए सरकार के समय इस मुद्दे पर विरोध का झंडा उठा लिया था। इस साल के शुरू में वे बांग्लादेश गई थीं; उनके रुख में बदलाव संभवत: इस यात्रा के बाद ही आया है।
Author May 4, 2015 17:46 pm

पिछले हफ्ते केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बांग्लादेश के साथ होने वाले भू-सीमा समझौते को मंजूरी दे दी। यह दिलचस्प है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा इस समझौते के खिलाफ थी और इसमें उसे राष्ट्रीय हितों का नुकसान दिख रहा था। यह भी गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब इस समझौते के पक्ष में हैं, जिन्होंने यूपीए सरकार के समय इस मुद्दे पर विरोध का झंडा उठा लिया था। इस साल के शुरू में वे बांग्लादेश गई थीं; उनके रुख में बदलाव संभवत: इस यात्रा के बाद ही आया है।

यह दोनों देशों के हित में होगा कि सीमा विवाद स्थायी रूप से सुलझा लिया जाए। पिछली सरकार के समय यह होते-होते रह गया तो इसके लिए भाजपा और तृणमूल कांग्रेस ही जिम्मेवार थीं। अब मोदी सरकार ने सीमा समझौते को मंजूरी तो दी है, पर असम को उसके दायरे से बाहर रखा है। इसलिए कि भाजपा की असम इकाई नहीं चाहती कि राज्य को समझौते में शामिल किया जाए। असम में भाजपा ने इसे एक भावनात्मक मुद््दा बनाए रखा है।

जब मनमोहन सिंह सरकार ने बांग्लादेश से सीमा समझौते की बात आगे बढ़ाई, तो असम में भाजपा सड़कों पर उतर आई थी, यह कहते हुए कि वह राज्य की एक इंच जमीन भी अन्य देश को नहीं सौंपने देगी। जबकि यह मामला अपनी जमीन गंवाने का नहीं, बल्कि दोनों तरफ के कुछ क्षेत्रों की अदला-बदली का रहा है। कुछ क्षेत्र भारत को छोड़ने हैं तो कुछ क्षेत्र बांग्लादेश भी भारत को सौंपेगा। इस बारे में सहमति 1974 में ही बन गई थी। इससे संबंधित प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर 2011 में हुए।

बांग्लादेश इस समझौते के क्रियान्वयन का बेसब्री से इंतजार करता रहा है। मुश्किल भारत की तरफ से रही है। पर क्या नया फॉर्मूला बांग्लादेश मंजूर करेगा? सीमा समझौते की बातचीत दोनों पक्षों के बीच एक पैकेज के तौर पर समग्र रूप में होती रही है।

असम वाले क्षेत्र को समझौते से बाहर रखना बांग्लादेश को स्वीकार्य होगा या नहीं, यह फिलहाल साफ नहीं है। चूंकि इस समझौते के अमल में आने पर सीमा के स्वरूप में बदलाव होगा, इसलिए संविधान संशोधन विधेयक पारित करा कर ही भारत सरकार इस दिशा में निर्णायक रूप से कदम बढ़ा सकती है। भाजपा के एतराज के कारण यूपीए सरकार के लिए इस संविधान संशोधन विधेयक को संसद की मंजूरी दिलाना संभव नहीं हो पाया था। अब कांग्रेस के सहयोग के बगैर मोदी सरकार के लिए भी वैसा कर पाना मुश्किल होगा, क्योंकि संविधान संशोधन विधेयक संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई समर्थन से ही मंजूर हो सकता है।

असम को समझौते से बाहर रखने की सूरत में कांग्रेस ने अपने समर्थन की संभावना से इनकार किया है। क्षेत्रों की अदला-बदली के सिलसिले में बंगाल, त्रिपुरा और मेघालय की कुल करीब दो हजार एकड़ जमीन बांग्लादेश को सौंपने की बात तो मोदी सरकार ने मान ली है, पर असम की दो सौ अड़सठ एकड़ जमीन को समझौते से बाहर रखा है।

इसकी वजह चुनावी है। असम में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और वहां भाजपा यह दर्शाना चाहती है कि वह अपने पहले के रुख पर अब भी कायम है। लेकिन इस हिस्से में विवाद बना रहेगा, तो अवैध घुसपैठ की गुंजाइश भी बनी रहेगी, जिसके खिलाफ भाजपा मुखर रही है। फिर, बांग्लादेश से सीमा समझौते का मसला राष्ट्रीय हितों और विदेश नीति से ताल्लुख रखता है। इसे एक राज्य के चुनावी समीकरण से प्रभावित क्यों होने दिया जाए? श्रीलंका के खिलाफ कई बार कड़े कदम उठाने की तमिलनाडु की पार्टियों की मांग पर केंद्र का जवाब यही रहा है कि वे विदेश नीति को तय नहीं कर सकतीं। भाजपा की असम इकाई की मांग पर भी केंद्र को यही रुख अपनाना चाहिए। वरना गलत संदेश जाएगा।

 

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