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नया अध्याय

आईएईए यानी अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की ओर से हरी झंडी मिलते ही ईरान पर चले आ रहे व्यापारिक प्रतिबंधों के हटने का रास्ता साफ हो गया।
Author नई दिल्ली | January 19, 2016 01:46 am
आईएईए यानी अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की ओर से हरी झंडी मिलते ही ईरान पर चले आ रहे व्यापारिक प्रतिबंधों के हटने का रास्ता साफ हो गया। (फाइल फोटो)

आईएईए यानी अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की ओर से हरी झंडी मिलते ही ईरान पर चले आ रहे व्यापारिक प्रतिबंधों के हटने का रास्ता साफ हो गया। एजेंसी ने जांच के बाद कहा कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम की बाबत किए गए वादे का पालन कर रहा है। गौरतलब है कि पिछले साल जुलाई में ईरान और अमेरिका समेत छह बड़ी शक्तियों के बीच हुए समझौते ने एक नए अध्याय की शुरुआत की थी। संयुक्त व्यापक कार्रवाई योजना नामक इस समझौते के तहत ईरान ने अपना विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम छोड़ देने की घोषणा की थी और बदले में संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और यूरोपीय संघ ने उस पर लगाए गए कारोबारी प्रतिबंध हटा लेने का भरोसा दिलाया था। अब वह समझौता अमल में आ गया है। पर इस वक्त ईरान को अंतरराष्ट्रीय बंधनों से मुक्ति मिलने में एक और चीज ने अहम भूमिका निभाई, वह है ईरान में कैद रखे गए कुछ अमेरिकी नागरिकों की रिहाई। इस समझौते से स्वाभाविक ही ईरान ने राहत की सांस ली है। बाकी दुनिया ने भी इसका स्वागत ही किया है।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम के संबंध में हुए समझौते का वैश्विक महत्त्व है। इसलिए कि अमेरिका और यूरोपीय संघ के संबंध ईरान से सुधरेंगे, जो कि 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से थोड़े-बहुत उतार-चढ़ाव के साथ कुल मिला कर तनावपूर्ण ही रहे हैं। ईरान से अमेरिका के तनाव भरे रिश्ते का असर अन्य खाड़ी देशों की बाबत अमेरिकी कूटनीति पर भी पड़ता रहा। ईरान से पश्चिमी दुनिया के संबंधों का नया अध्याय शुरू हो रहा है तो इससे मध्य पूर्व के समीकरण नए सिरे से प्रभावित हो सकते हैं। अपने संदिग्ध एटमी कार्यक्रम के चलते ईरान कोई पांच साल तक संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी देशों की तरफ से लगाए गए प्रतिबंध झेलता रहा। इससे उसकी आर्थिक हालत दिनोंदिन बिगड़ती गई। 2013 में हसन रूहानी ने ईरान के राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी संभालते ही एलान किया कि वह दुनिया से ईरान का अलगाव खत्म करेंगे। फिर इसके दूसरे ही साल परमाणु समझौते की घोषणा हो गई।

अब क्रियान्वयन का दौर शुरू होते ही रूहानी ने इसे दुनिया के साथ जुड़ने का अवसर और स्वर्णिम अध्याय कहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसे मजबूत अमेरिकी कूटनीति की उपलब्धि करार दिया है। पर अब भी अमेरिकी कांग्रेस के भीतर ऐसे लोगों की कमी नहीं, जिन्हें ईरान के इरादे पर शक है। इजराइल की प्रतिक्रिया इससे भी कठोर है। दरअसल, इजराइल नहीं चाहता कि अमेरिका और ईरान में नजदीकी बढ़े। बहरहाल, पाबंदियों के हटने से ईरान विदेशों में जब्त अपनी सौ अरब डॉलर की पूंजी वापस पा सकेगा। इससे उसकी वित्तीय दशा सुधरने का एक जरिया तुरंत मिल जाएगा। फिर, वह मनचाही मात्रा में तेल बेच सकेगा। यह भारत के लिए भी राहत की बात है। प्रतिबंधों के पहले, सऊदी अरब के बाद ईरान से ही सबसे ज्यादा कच्चा तेल भारत आयात करता रहा, वह भी बेहतर कारोबारी शर्तों पर। प्रतिबंध लगने के बाद भारत को तेल बेचने वाले देशों में ईरान का स्थान खिसक कर सातवें पायदान पर आ गया। ईरान के कच्चे तेल की गुणवत्ता भी बहुत अच्छी है, जिस वजह से भारत की तेलशोधक कंपनियां उसे तरजीह देती रही हैं। लेकिन विश्व-अर्थव्यवस्था का यह ऐसा दौर है जब कच्चे तेल के दाम में अप्रत्याशित गिरावट का सिलसिला चल रहा है। लिहाजा, ईरान फिलहाल तेल के जरिए अपेक्षित कमाई नहीं कर सकता, उसे अपनी अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए अन्य उपाय भी सोचने होंगे।

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